ये जर्जर वीरान हवेली
खड़ी है जो हिम्मत हारे
वो जो शहर चले गये
उन्ही की राह निहारे है।
जहाँ कभी शहनाईयों से
गूंजती थी दरो दीवारें
आज सन्नाटे ही सन्नाटे
है यहाँ पावँ पसारे।
कभी यहाँ ठकुराईन की
पायल की आवाज से
ठाकुर के दिल की
बगिया खिला करती थी।
और ठाकुर की बन्दूक की
आवाज से अक्सर
ये धरती हिला करती थी।
जिस हवेली की प्रांगण मे
सेवकों की चहल कदमी
दिन रात रहा करती थी।
जहाँ दिन रात गावँ वालों का
आना जाना रहा करता था।
आज वो हवेली अकेली खड़ी
अपनी दुर्दशा पे रोया करती है।
कविता गुज्जर
