बम का दर्शन (अंतिम भाग )
उन्हें तो किसी ने अहिंसा का उपदेश नहीं दिया था बल्कि हम तो यहां तक कहेंगे कि अहिंसा तथा गांधीजी का समझौता निधि से ही उन शक्तियों में फूट पड़ गई जो सामूहिक मोर्चे के मनारे से एक हो गई थी। यह प्रतिपादित किया जाता है कि राजनीति कन्याओं का मुकाबला अहिंसा के स्वास्थ्य से किया जा सकता है पर इस विषय में संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि यह अनोखा विचार है जिसका अभी प्रयोग नहीं हुआ है।
दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के जो न्यायोचित अधिकार मांगे जाते थे उन्हें प्राप्त करने में अहिंसा का शस्त्र असफल रहा।वह भारत को स्वराज दिलाने में भी असफल रहा ,जबकि राष्ट्रीय कांग्रेस स्वयंसेवकों की एक बड़ी सेना उसके लिए प्रयत्न करती रही तथा उस पर लगभग सवा करोड़ रूपया भी खर्च किया गया। हाल ही में बारदोली सत्याग्रह में इसकी असफलता सिद्ध हो चुकी है। इस अवसर पर सत्याग्रह के नेता गांधीजी और पटेल ने बारदोली के किसानों को जो कम से कम अधिकार दिलाने का आश्वासन दिया था ,उसे भी वे न दिला सके। इसके अतिरिक्त अन्य किसी देशव्यापी आंदोलन की बात हमें मालूम नहीं। अब तक इस अहिंसा को एक ही आशीर्वाद मिला हुआ था असफलता का। ऐसी स्थिति में यह आश्चर्य नहीं कि देश ने फिर उसके प्रयोग से इनकार कर दिया। वास्तव में गांधीजी जिस रूप में सत्याग्रह का प्रचार करते हैं वह एक प्रकार का आंदोलन है, एक विरोध है जिसका स्वाभाविक परिणाम समझौते में होता है ,जैसा प्रत्यक्ष देखा गया है। इसलिए जितनी जल्दी हम समझने की स्वतंत्रता और गुलामी में कोई समझौता नहीं हो सकता उतना ही अच्छा है।
गांधीजी सोचते हैं हम नए युग में प्रवेश कर रहे हैं । परंतु कांग्रेस भी विधान में शब्दों का हेर फेर मात्र कर ,अर्थात स्वराज को पूर्ण स्वतंत्रता कह देने से नया युग प्रारंभ नहीं हो जाता। वह दिन वास्तव में एक महान दिवस होगा जब कांग्रेस देश व्यापी आंदोलन प्रारंभ करने का निर्णय करेगी जिसका आधार सर्वमान्य क्रांतिकारी सिद्धांत होंगे। ऐसे समय तक स्वतंत्रता का झंडा फहराना हास्यप्रद होगा। इस विषय में हम सरला देवी चौधरानी के उन विचारों से सहमत हैं जो उन्होंने एक पत्र संवाददाता को भेंट में व्यक्त किए। उन्होंने कहा 31 दिसंबर 1929 की अर्धरात्रि की ठीक 1 मिनट बाद स्वतंत्रता का झंडा फहराना एक विचित्र घटना है। और उस समय जी ओ सी असिस्टेंट जी ओ सी तथा अन्य लोग इस बात को अच्छी तरह जानते थे कि स्वतंत्रता का झंडा फहराने का निर्णय आधी रात तक अधर में लटका है ,क्योंकि यदि वॉइस सराय सेक्रेटरी ऑफ स्टेट का कांग्रेस को यह संदेश आ जाता है कि भारत को आउपनिवेशिक स्वराज्य दे दिया गया है ,तो रात्रि को 11:59 पर भी स्थिति में परिवर्तन हो सकता था। इससे स्पष्ट है कि पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्ति का ध्येय नेताओं की हार्दिक इच्छा नहीं थी बल्कि एक बालहठ के समान था।भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लिए उचित तो यही होता कि वह पहले स्वतंत्रता प्राप्त कर फिर उसकी घोषणा करती। यह सच है कि अब औपनिवेशिक स्वराज के बजाय कांग्रेस के वक्ता जनता के सामने पूर्ण स्वतंत्रता का ढोल पीटेंगे। वह अब जनता से कहेंगे कि जनता को संघर्ष के लिए तैयार हो जाना चाहिए जिसमें एक पक्ष तो मुक्केबाजी करेगा और दूसरा उन्हें केवल सहता रहेगा जब तक कि वह खूब पीटकर इतना हताश ना हो जाए कि फिर ना उठ सके क्या उसे संघर्ष कहां जाता है ?और क्या इससे देश को स्वतंत्रता मिल सकती है किसी भी राष्ट्र के लिए सर्वोच्च लक्ष्य प्राप्ति का ध्येय सामने रखना अच्छा है परंतु साथ में यह भी आवश्यक है कि इस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए उन साधनों का उपयोग किया जाए जो योग्य हो और जो पहले उपयोग में आ चुके हो अन्यथा संसार के सम्मुख हमारे हास्य पद बनने का भय बना रहेगा।
गांधी जी ने सभी विचार से लोगों से कहा कि वह लोग क्रांतिकारियों से सहयोग करना बंद कर दें तथा उनके कार्यों की निंदा करें जिससे हमारे इस प्रकार उपेक्षित देशभक्तों की हिंसात्मक कार्यों से जो हानि हुई उसे समझ सके। लोगों को उपेक्षित तथा पुरानी दलीलों के समर्थक कह देना जितना आसान है उसी प्रकार उनकी निंदा कर जनता से उनसे सहयोग ना करने को कहना जिससे वह अलग अलग हो अपना कार्यक्रम स्थगित करने के लिए बाध्य हो जाए यह सब करना विशेष रूप से उस व्यक्ति के लिए आसान होगा जो कि जनता के कुछ प्रभावशाली व्यक्तियों का विश्वास पात्र हो। गांधीजी ने जीवन भर जन जीवन का अनुभव किया है पर वह बड़े दुख की बात है कि वह भी क्रांतिकारियों का मनोविज्ञान ना तो समझते हैं और ना ही समझना ही चाहते हैं। वह सिद्धांत अमूल्य है जो प्रत्येक क्रांतिकारी को प्रिय है। जो व्यक्ति क्रांतिकारी बनता है जब वह अपना सिर हथेली पर रखकर किसी भी आत्म बलिदान के लिए तैयार रहता है तो वह केवल खेल के लिए नहीं वह यह त्याग और बलिदान इसलिए भी नहीं करता कि जब जनता उसके साथ सहानुभूति दिखाने की स्थिति में हो तो उसकी जय जयकार करें। वह इस मार्ग का इसलिए अलंबन करता है कि उसका सद्विवेक उसे इसकी प्रेरणा देता है उसकी आत्मा उसे इसके लिए प्रेरित करती है।
एक क्रांतिकारी सबसे अधिक तर्क में विश्वास करता है। वह केवल तर्क और तर्क ही में विश्वास करता है। किसी प्रकार का गाली गलौज जा नींद आ जाए फिर वह उच्च से उच्च स्तर से की गई हो उसे वह अपनी निश्चित उद्देश्य प्राप्ति से वंचित नहीं कर सकती। यह सोचना कि यदि जनता का सहयोग ना मिलाया उसके कार्य के प्रेशर ना की गई तो वह अपने उद्देश्य को छोड़ देगा ,निरी मूर्खता है।अनेक क्रांतिकारी जिनके कार्यों की वैधानिक आंदोलनकारियों ने घोर निंदा की फिर भी वह उसकी परवाह न करते हुए फांसी के तख्ते पर झूल गए। यदि तुम चाहते हो कि क्रांतिकारी अपनी गतिविधियों को स्थगित कर दे तो उसके लिए होना तो यह चाहिए कि उसके साथ तर्क द्वारा अपना मत प्रमाणित किया जाए। यह एक और केवल यही एक रास्ता है और बाकी बातों के विषय में किसी को संदेह नहीं होना चाहिए। क्रांतिकारी इस प्रकार की डरावनी धमकाने से कदापि हार मानने वाले नहीं।
हम प्रत्येक देश भक्तों से निवेदन करते हैं कि वह हमारे साथ गंभीरता पूर्वक इस युद्ध में शामिल हो। कोई भी व्यक्ति अहिंसा और ऐसे ही अजीबोगरीब तरीकों से मनोवैज्ञानिक प्रयोग कर राष्ट्र की स्वतंत्रता के साथ खिलवाड़ ना करें। स्वतंत्रता राष्ट्र का प्राण है। हमारी गुलामी हमारे लिए लज्जस्पद है,ना जाने कब हमने यह बुद्धि और साहस होगा कि हम उससे मुक्ति प्राप्त कर स्वतंत्र हो सके ? हमारी प्राचीन सभ्यता और गौरव की विरासत का क्या लाभ यदि हमें यह स्वाभिमान ना रहे कि हम विदेशी गुलामी विदेशी झंडे और बादशाह के सामने सर झुकाने से अपने आप को ना रोक सके।
क्या यह अपराध नहीं है कि ब्रिटेन ने भारत में अनैतिक शासन किया हमें भिखारी बनाया हमारा समस्त खून चूस लिया एक जाति और मानवता के नाते हमारा घोर अपमान तथा शोषण किया गया है।क्या जनता अभी चाहती है कि इस अपमान को बुलाकर हम ब्रिटिश शासकों को क्षमा कर दें। हम बदला लेंगे जो जनता द्वारा शासकों से लिया गया न्यायोचित बदला होगा। कायरों को पीठ दिखाकर समझौता और शांति की आशा से चिपके रहने दीजिए। हम किसी से भी दया की भीख नहीं मांगते हो और हम भी किसी को क्षमा नहीं करेंगे। हमारा युद्ध विजय या मृत्यु के निर्णय तक चलता ही रहेगा। क्रांति चिरंजीवी हो ।
करतार सिंह
प्रेसिडेंट
क्रमशः
गौरी तिवारी
भागलपुर बिहार
