एक सांस का चलना रूक गया,
 सुर का साधना थम गया…
हृदय के तारों को झंकृत करता
एक नाद तिरोहित हो गया…
पर राग तो कभी मरते नहीं!
भाव कभी मरते नहीं !
शरीर के बन्धनों से मुक्त 
हो ..अवलंबित रहेगी सदा
वह साधना…वह आराधना…
किया समर्पित जीवन सारा 
तज निज पीड़ा को…
 सरगम की संगिनी बन
ताज स्वर कोकिला की
सुशोभित करती रहीं।
कितनों के ह्रदय के बोल
छंदों में बांधती रहीं। 
है शब्दों की श्रद्धांजलि उनको
जो खुद भी जीती रहीं 
जीने की चाह जगाती रहीं।
तज निज पीड़ा को 
बस सुरों को साधते रहीं। 
       ✍डॉ पल्लवीकुमारी”पाम
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