चाहे कह लो मुझको स्वार्थी,
समाज विरोधी एक आदमी,
आधुनिकता के रंग से सरोबार,
पागल कोई आशिक मुझको,
या फिर जोरू का गुलाम मुझको ।
चाहे कह लो मेरे बारे में तुम, 
कि गरीबों से मुझको ईर्ष्या है,
अमीरों से मुझको याराना है,
पसंद नहीं है मुझको परम्परायें,
बंधा नहीं हूँ मैं किसी मजहब से,
लेकिन मत लगाना यह आरोप,
कि मैं भूल गया हूँ अपना बचपन,
उस माँ को , जिसकी कोख से जन्मा हूँ,
मत कहना तुम यह कभी,
कि मुझको नहीं है किसी से प्यार,
पत्थर का बना है मेरा हृदय,
खत्म हो चुकी है मुझमें संवेदनायें,
कि मुझको याद नहीं आती है ,
मेरी वह मातृभूमि, वह गली ,
जिसकी गोद में सीखा हूँ मैं,
चलना, बोलना, खेलना और ,
जीना अपनी यह जिंदगी कभी,
हाँ मैं जाऊँगा एक दिन सच में, 
मेरी मातृभूमि से मिलने दोस्तों।
साहित्यकार एवं शिक्षक-
गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद
तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)
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