पश्चिम की तरफ़ चलता हूँ तो
पश्चिम की चीज़ें पूर्व में खिसकने
लगती हैं
देखता हूँ कि
चलना शुरू करते ही
भूगोल से मुक्त होने लगती हैं दिशाएँ
और इतिहास में जाने को उत्सुक हो
उठती हैं
उत्तर के उत्तर में ही जाते ही
दक्षिण में बदल जाता है उत्तर
हालाँकि बर्फ़ वहाँ भी उतनी ही जमी
मिलती है किसी को अजीब नहीं
लगता
कि दिशाएँ हैं चार और सूरज सिर्फ़
एक
चार सूरज होते
तो हर दिशा पूर्व होती
हर दिशा पश्चिम
हर दिशा उत्तर और हर दिशा दक्षिण
हम एक दिशा मे चलते हुए चारों
दिशाओं में जा सकते
चार सूरजों की सुबह होती
चार सूरजों की शाम
रात होती गहरी
चार सूरजों के न होने की
लेकिन तब सूरजों की होती परिक्रमा
या पृथ्वी की
ऋतुओं का क्या होता
क्या होता चार सूरजों के पार पृथ्वियों
के स्वप्न का
रक्त के लौह कणों के लिए उत्तर दक्षिण
चुंबकत्व की दिशाएँ तब होतीं या न
होतीं
घर के बीचो बीच खड़ा होकर देखता हूँ
कि चारों दिशाओं में है मेरा घर
पूरब में सोने का कमरा है
उसके दक्षिण में पलंग है
जिसकी पश्चिमी पाटी के किनारे
पड़कर पाता हूँ
कि उत्तर में सिर है
दक्षिण में पाँव
एक हाथ पूरब
तो एक हाथ पश्चिम
दक्षिण में होता है दर्द
तो उत्तर में होता है रतजगा
एक दिन नहीं होती कोई दिशा
एक दूसरे को बाँहों में भरे दो दिशाएँ
अनंत दूरी पर पीठ किए दिखती हैं
आज खोजता हूँ दिशा
अपने अँधेरों को स्पर्शों से आलोकित
करने की
साथ-साथ भीगने की
बेसली नदी की सोन रेखा की
गोहद के छोटे से आँगन में झरती हुई
नीम की पत्तियों की
कोई दिशा नहीं है
दोस्तो हम सबकी एक साथ एक दिशा
होना ज़रूर चाहिए
लेकिन याद रखना चाहिए
कि हर दिशा में होती हैं चार दिशाएँ
और पाँचवीं की गुंजाइश हरदम बनी
रहती है।
रंजना झा
