पूरब और पश्चिम ये केवल दो शब्द नहीं, दो दिशाएं नहीं ये तो बहुत कुछ कह जाते,समझा जाते हैं।
समझ सको तो समझ लो प्यारे, क्या है इनका मर्म?
क्या-क्या इनके अभ्यन्तर में है,लगाओ ऐसी जुगत।
कहीं पति-पत्नी तो कहीं भाई-भाई, या फिर मिलेंगे बॉस और सहायक।
चले जाओ यदि समाज का उठाने पर्दा तो राजा-रंक, अमीर-गरीब। अभ्यन्तर की आँखे खोल कर देखो हर ओर मिलेगा देखने को फलसफा पूरब और पश्चिम का।उसको दिया जा सकता है संबोधन ३६ के आंकड़े का भी तो जल्दी समझ में आ जाएगा। ऐसे में कुछ तो बैठा लेते हैं सामंजस्य अपनी बुद्धि-विवेक और समझदारी का उपयोग और परिचय देकर, समझौता कर लेते हैं अपने कर्म,भाग्य एवं प्रारब्ध के नाम पर, अभ्यस्त हो जाते हैं परिस्थितियों के तो कट जाता है उनका सफर उसी बगिया में बागबानी करते हुए। जो ऐसा करने में सक्षम नहीं होते वो दो राहों के मुसाफ़िर बन अपनी नौका की पतवार के स्वयं ही उत्तरदायी होते हैं। समझौता नाम से दूर-दूर तक नहीं होता उनका कोई नाता।
अच्छा होगा कि हर मोड़ पर ३६ के आंकड़े को ६३ का आंकड़ा बनाने का प्रयास किया जाए और इस उपवन को सकारात्मकता से प्लावित कर हर असंभव दिखने वाले को भी संभव कर दिया जाए। निश्चित मानिए अगर आप ठान लेंगे तो कुछ भी असंभव या मुश्किल नहीं होगा। जो आप सामने वाले को परोसेंगे लौट फिर कर वही आपको मिलना है,तो क्यों न जो आपको स्वयं के लिए पसंद नहीें,वह किसी को भी न दें। सीधी सी बात है जिओ और जीने दो। दूसरों को मुस्कान बांटकर स्वयं भी हँसते मुस्कराते रहो। तभी तो हो सकेगा पूरब और पश्चिम का मनभावन मिलाप।मिल सकता है मनचाहा परिणाम। स्व (मैं)से उठकर देखो और स्व को पहचानो। कहीं दूर नहीं है लक्ष्य, उसे मुट्ठी में भर लो। पूरब और पश्चिम का मेल निश्चित ही हो जाएगा ऐसा मेरा पुरजोर विश्वास है।
धन्यवाद!
लेखिका-
सुषमा श्रीवास्तव
मौलिक विचार
सर्वाधिकार सुरक्षित
उत्तराखंड।
