हजारों शौक कर लिये, अपनी हस्ती सजाने को।
अब कोई शौक नहीं रहा, अपनी बस्ती बसाने को।।
हजारों शौक कर लिये———————।।
हम भी मोहब्बत करते थे, ख्वाब दिल में सजाकर।
वफ़ा अपनी निभाते थे, खूबी उसमें बताकर।।
लेकिन अब साथ है उसके, कोई हमदर्द उसका।
शौक अब हमको नहीं रहा, हाथ उससे मिलाने को।।
हजारों शौक कर लिये——————–।।
 रहे उनके करीब हम, करीबी उनको समझकर।
खुशी हर उनको देते थे, खुद को खुशनसीब समझकर।।
लेकिन अब वो रहते हैं, ताजमहल अपना बनाकर।
शौक अब हमको नहीं रहा, उनको दिल से लगाने को।।
हजारों शौक कर लिये————————।।
कफ़न हम देखा करते हैं , बाजार में आते – जाते।
देखते  ख्वाब नहीं हसीन, रात को हम सोते – सोते।।
दुहा हम यहीं करते हैं , दिल से नहीं प्यार करना तुम।
शौक अब हमको नहीं रहा, किश्ती आगे बढ़ाने को ।
हजारों शौक कर लिये———————-।।
साहित्यकार एवं शिक्षक-
गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद
तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)
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