अखबार की सुर्खियां अखबार के में एक अहम भूमिका रखती हैं। यदि सुर्खियाँ नहीं होंगीं तो विवरण कहाँ से होगा? यदि विवरण नहीं होगा,तो अखबार का कलेवर कैसे तैयार होगा? कुछ लोग तो केवल सुर्खियों को ही पढ़ कर इतिश्री कर लेते हैं, और कुछ मनपसंद सुर्खियों का विवरण पढ़ते हैं। खैर, अक्षरशः  पूरा अखबार पढ़ने वाले कुछ लोग ही होते हैं।सुर्खियाँ ही बताती हैं कि वह समाचार कैसा होगा उसे पढ़ना चाहिए या नहीं  इसलिए इसलिए इन सुर्खियों पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। न तो यह बहुत लंबी होनी चाहिए और न ही बहुत छोटी ।सुर्खियाँ ऐसी हों कि घटना के विषय में जानने की उत्सुकता तीव्र से तीव्रतर होती जाए। तभी अखबार की सफलता साबित हो सकेगी। यह सभी कार्य संपूर्ण अखबार-कुटुम्ब  पर निर्भर करता है।मुख्य रूप से जिम्मेदारी संपादक और प्रूफ रीडर पर होती है। लेकिन सुर्खियां देने वाला तो पत्रकार है जो अपनी पत्रकारिता की काबिलियत इसी बलबूते पर साबित करता है कि वह कैसे प्रस्तुत कर रहा है। उसकी प्रस्तुति उसके कार्य के सफलता असफलता की गवाह होती है, और उसकी सफलता के सोपान का निर्माण करती है। पाठकों की संख्या को अखबार की सफलता का श्रेय दिया जाता है लेकिन मेरे विचार से ऐसे काफी लोग होते हैं जो अखबार तो ले लेते हैं पर पूरा पढ़ते नहीं हैं, कुछ के लिए उनका स्टेटस सिंबल होता है अखबार लेना ,कुछ के लिए चाय की चुस्कियों का साथी तो कुछ केवल रद्दी में बेचकर ही प्रसन्न हो जाते हैं या फिर कुछ लोग उसका और भी उपयोग, सदुपयोग या दुरुपयोग करते हैं ।मेरा तो यही कहना है सुर्खियों के साथ-साथ उसका विश्लेषण भी प्रभावकारी होना चाहिए। जिससे उस अखबार की गुणवत्ता एवं लोकप्रियता में बढ़ोत्तरी हो सके।
   लेखिका –
सुषमा श्रीवास्तव 
मौलिक विचार 
उत्तराखंड
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