सुजान और कापाली दोनों मदालसा के घर और गांव का पता पूछ रहे थे ताकि वे उसे उसके घर तक छोड़ आ सकें। दूसरी तरफ मदालसा का मन ज्यादा ही व्यग्र हो रहा था। वैसे वह अपना सत्य सुजान और कापाली को बता सकती थी। भाइयों पर तो विश्वास किया ही जा सकता है। वैसे खतरा होने की स्थिति में वह कुण्डला को याद भी कर सकती थी। मन से मन के तार जुड़े होते हैं। कुण्डला निश्चित ही उसकी पुकार सुन लेती। पर इस समय मदालसा की व्यग्रता का कुछ अलग ही कारण था। इस समय वह हो रहा था जो आज तक उसने कभी अनुभव नहीं किया था।
   सामने एक युवक खड़ा था। वैसे साधारण वस्त्र पहने था। पर निश्चित ही साधारण न था। मनुष्य अपने वंश के गुणों को छिपाकर भी छिपा नहीं पाता है। गुरुकुल में रहने पर भी एक राजकुमार अलग ही व्यक्तित्व रखता है। ऋतुध्वज को देख मदालसा को अलग ही अनुभूति हो रही थी। मानों वह उसे पहले से जानती है। मानों कि वह उसके मानस के चिंतन का पुराना विषय है। मानों कि वैराग्य की अनंत कहानियों के अतिरिक्त उन दोनों की भी एक कहानी हो जो कि उसके अवचेतन मन में कहीं छिपी हुई हो।
   दूसरी तरफ राजकुमार ऋतुध्वज को भी मदालसा के समान अनुभूति हो रही थी। दोनों ही एक दूसरे का परिचय जानना चाहते थे। दोनों ही संकोच के कारण शांत थे। जबकि सुजान और कापाली से वार्तालाप करने में मदालसा को कोई संकोच नहीं हुआ था।
   वैसे तो गोमती नदी के तट का मौसम सुहाना था। पर दोनों को बसंत का मौसम लगने लगा था। चारों तरफ फूलों की बहार दिखाई देतीं। कल कल करती नदी सुमधुर गान गाती लगती।
   राजकुमार भी नजदीक आ गया। हालांकि वह मदालसा के विषय में जानने को बैताब था। फिर भी खुद बोल पाने में असमर्थ था। पर दोस्तों ने पता कर ही लिया होगा। इसलिये अपने मित्रों से मदालसा के विषय में पूछने लगा।
   ” मित्रों। यह कन्या किस गांव से आयी हैं। इन्हें कोई परेशानी तो नहीं है। इस भीषण वन में कैसे विचरण कर रही हैं।”
   सुजान और कापाली दोनों राजकुमार के मन के भावों को पढ रहे थे। आज उन्हें राजकुमार कुछ अलग लग रहे थे।
   ” जो भी हैं। पर बहुत साहसी कन्या हैं। इन्हें वन्य जीवों से भय नहीं लगता है। निश्चित ही ये विवश नहीं हैं। निश्चित ही ये कोई महान अन्वेषिका हैं। इन वनों में अन्वेषण के लिये भी बहुत कुछ है। फिर भी इस तरह असावधानी उचित नहीं।”
  मदालसा समझ चुकी थी कि अब उसे खुद के विषय में कुछ तो बताना होगा। क्या बताना है, यह भी समझ गयी। सुजान की बात से ही राह निकल गयी। 
” मैं मदालसा। इधर पास की नहीं हूं। आयुर्वेद की छात्रा हूं। दूर आयुर्वेद के आचार्य धन्वंतरि की प्रिय छात्रा। गुरुदेव के आदेश से ही वनीय क्षेत्रों से औषधियों का चयन करती हूं। यह सब मेरी शिक्षा का भाग है। मेरी सुरक्षा की चिंता मेरे गुरुदेव को भी है। वह अनेकों सिद्धियों के स्वामी भी हैं। उनकी अज्ञात शक्तियां हमेशा मेरी रक्षा करती हैं। फिर मुझे क्या भय। वैसे भी स्त्रियों को भयभीत होने की क्या आवश्यकता। स्त्रियों ने तो असुरों को भी पराजित कर दिया था। “
   स्त्रियों द्वारा असुरों के पराजय की गाथा राजकुमार ऋतुध्वज ने भी सुनी थी। किस तरह अनेकों बली असुर देवी कात्यायनी तथा अन्य देवियों के हाथों मृत्यु को प्राप्त हुए थे। वैसे उस समय वह बहुत छोटा था। फिर भी उसे याद था कि एक बार उसके राज्य में भी एक स्त्री नारी चेतना की अलख जगाने आयी थी। जब वह अपने सुमधुर कंठ से गान गाती, तब सोती हुई स्त्रियां भी जग जातीं। क्या नाम था, उस अद्वितीय महिला का। हाॅ याद आया। उसे सब कुण्डला कहकर बुलाते थे। शायद उनके पति भी असुरों के हाथों मृत्यु को प्राप्त हुए थे। पर विधवा की तरह रोने के स्थान पर वह खुद नारियों को जगाने निकल लीं। कितने ही राज्यों में घूमीं। नगरों और गांवों तक में अपने गीतों से अलख जगाती थी। 
   कुण्डला की चर्चा ने मदालसा को अनोखा आनंद दिया। सचमुच उसकी बहन बहुत साहसी है। पृथ्वी पर अभी भी लोग उसे याद करते हैं। फिर उचित समय पर मिलने का वचन देकर मदालसा चली गयी। तीनों मित्र मदालसा को जाता देखते रहे। वैसे उन्हें ज्ञात न था कि यह आयुर्वेद की छात्रा उन्हें फिर कब और कहाॅ मिलेगी। 
  यदि सोते और जगते भी मन किसी विशेष का ही चिंतन करने लगता है। यदि कोई हर रोज सपनों में आकर नींद उड़ा देता है। यदि जिंदगी के हर पल कुछ ज्यादा ही हसीन लगने लगें तो निश्चित ही यह एक रोग है। भले ही सभी रोगों की औषधि बन जाये पर यह प्रेमरोग वह रोग है जिसकी कोई औषधि ही नहीं है। प्रेम वह सूक्ष्म परजीवी है जो कि एक बार रक्त विंदुओ में प्रवेश कर उन्हीं रक्त की बूदों में एकीकार हो जाता है। कभी मन को तड़पता है। मिलन की बेकरारी में दिनों को युग समान दिखाता है। पर दूसरा सत्य यह भी है कि मनुष्य को मन के सभी वेगों को सहन करना होता है। खासकर विद्यार्थियों को। यदि प्रेम के प्रवाह में विद्यार्थी अपना ध्येय भूल जाता है तो इससे अधिक दुख की क्या बात होगी। यदि प्रेम सत्य है तो यह भी सत्य है प्रेम अपनी राह निकाल ही लेता है। पर सच्चा प्रेम कभी भी किसी विद्यार्थी को विद्या से दूर नहीं करता है। अभी तो राजकुमार खुद की और उस कन्या की विद्या पूरी होने की ही प्रतीक्षा कर रहे हैं। हालांकि उन्हें लग रहा था कि उन्होंने अपनी जीवन संगिनी को तलाश लिया है। विद्या पूरी करने के बाद वह एक बार फिर से उस कन्या को ढूंढेंगें और उसके मन के भाव जानकर उसे अपनी अर्धांगिनी बनायेंगे। 
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
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