कल करना जो हो चाहते,उसे करो तुम आज।
आज जो करना है तुम्हें,अभी करो वो काज।।
समय बड़ा गतिमान है,सबपर है उसका राज।
किसीको मालुम है नहीं,कब गिर जाए गाज।।
कुछ तो लोग कहेंगे ही,कहने से न आएं बाज।
अपना ना कोई देखता,दूजे का खोजते राज।।
यही रीति संसार की है,लोगों का यही अंदाज।
दूसरों पर कीचड़ डालें,अपना ना खोलें राज।।
खुद काम से काम रखें,खोजें न किसी के राज।
सुखी रहने का ये मंत्र है,आदत से आयें बाज।।
दुनिया मे हैं जो भी सुखी,उनके सुख का राज।
बनते ना हैं वे कभी,किसी के कोढ़ की खाज।।
स्वदुःख से ना दुःख है, दूजे की खुशी से दुःख।
सोचे कैसे हूँ मैं दुःखी,अगला कैसे भोगे सुख।।
देते जो सब को दुःख हैं,पाते भी वही हैं दुःख।
ये निज कर्म फल है,कर्ता के हाथ सुख दुःख।।
अपने धर्म से ना चूकिए,ना हों कर्तव्य विमुख।
पूर्वाग्रह से न हों ग्रसित,तो प्रेम दिखे सम्मुख।।
सबको ही गले लगाइये,अहंकार देता है दुःख।
मिलजुल रहने का मजा, केवल सुख है सुख।।
घर परिवार हो या संस्था, आता जाता है सब।
सदा कहीं ना सुख रहे,सदा न रहता है दुःख।।
निज स्वभाव व कर्म से,सदा मिला दुःख सुख।
कौन भला जग में ऐसा,पाया नहीं सुख दुःख।।
ईश्वर का सुमिरन करिये,हाथों से अच्छा काम।
दिल से भी अच्छा बनिये,बुरा न करिये काम।।
रोतों के ये आँसू पोंछिए,होठों को दो मुस्कान।
कुछ न साथ में जायेगा,छूटेगा सकल जहान।।
हाथ पसारे आया था,हाथ पसारे जाएगा जान।
फिर काहे ये मचा झगड़ा,काहे का अभिमान।।
शांतिप्रिय जीवन जी लें,चेहरे पर रखें मुस्कान।
तू तू मैं मैं से ये रार बढ़े, और होंगे लहूलुहान।।
दुनिया देख रही है कैसे,युद्ध हो रहा घमासान।
सबकुछ खोता जारहा है,निर्दयी बनाहै इंसान।।
कल पे कुछ ना छोड़िये,आजही करें समाधान।
प्रेम भाव ही उपजाइये,पाइये सब का सम्मान।।
राम नाम ही सत्य है,सबकी यही गत्य है जान।
कोई नहीं जो सदा रहेगा,मत बनिये अनजान।।
राजा हो या रंक कोई हो,सब जाते हैं शमशान।
कफन 1 है सबका साथी,जो अंतिम परिधान।।
रचयिता :
डॉ. विनय कुमार श्रीवास्तव
वरिष्ठ प्रवक्ता-पीबी कालेज,प्रतापगढ़ सिटी,उ.प्र.
