सहृदयता.. 

सुलभता..
सुवासित.. 
वह आत्मज्ञान.. 
घेरे हैं चहुँ ओर से 
ढूंढते हैं कहीं – 
” उपवास का विज्ञान !”
अंतर्निहीत ये शक्ति है 
समभाव है विरक्ति है 
कह रहा अवचेतन मन 
अवरोध है या उन्नयन ? 
आंख मीचे चल रहा 
निस्तेज सा क्यूँ ढल रहा ? 
कर रहे हिय तले संचय 
उदगम है या है अवसान ? 
आस का पंक्षी चला 
उच्छ्वास भरते 
ओस की बुंदो से करता
प्रश्न अकुलाहट भरा 
नश्वर जगत का मेल है ये
 नियति का ऋण खेल है ये
है समाया दंभ अंतर में 
उठी ज्वाला महान 
खोजता है उर्ध्व  में 
है ढुंढता “उपवास का विज्ञान “
अन्न जल का कर रहे उपवास जब 
दूर होता है अधिक संत्रास तब 
हो विलय इस क्षितिज में
तृष्णा तिरोहित 
अल्प है संकल्प 
का आगाज तब 
कर सके उपवास 
तम को दूर करके 
घृणा द्वेष कपट कलह 
का त्याग कर के 
हो कभी उपवास 
रसना के रसों का 
अपभ्रंश का परित्याग
कर उपवास का आनंद भर  
हो परिवर्तित मानव महामानव में 
भर जाए अक्षुण्ण प्रेम का सागर
चराचर में वर्णित हो जीव का उत्थान
तभी सार्थक होगा ” उपवास का विज्ञान!!
 
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