बाबु जी इस बार सरस्वती पूजा के दिन आपको भी मेरे साथ महाविद्यालय चलना है.. सेवानिवृत्त प्राचार्य दीनदयाल जी के प्राध्यापक सुपुत्र शिवेश्वर जी ने कहा। सरस्वती पूजा के उपलक्ष्य में आपको मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया है। थोड़ी देर में महाविद्यालय के प्राचार्य महोदय आपको आमंत्रित करने स्वयं आएंगे.. शिवेश्वर जी अपनी बात पूरी करते हुए कहते हैं।
बहुत धूम धाम से माँ शारदे की अराधना सम्पन्न हुई। महाविद्यालय से बाहर आते ही शिवेश्वर जी के ड्राइवर ने गाड़ी में कुछ ख़राबी आ जाने की सूचना देते हुए बताया कि गाड़ी के पूर्णतः ठीक होने में लगभग दो तीन घंटे लग जाएंगे।
शिवेश्वर चलो बेटा आज रिक्शा से ही चलते हैं.. बहुत दिन हो गए तुम्हारे साथ रिक्शा की सवारी किए.. दीनदयाल जी बच्चों की तरह चहकते हुए बोलते हैं।
एक रिक्शा ले आओ.. शिवेश्वर जी आदेशात्मक लहजे में ड्राइवर से कहते हैं।
ड्राइवर वही खड़ा एक रिक्शेवाले को बुलाता है।
आज के दिन साक्षात सरस्वती पुत्र मेरे रिक्शे पर बैठेंगे..मैं और मेरा रिक्शा धन्य हो गया…ये सुनकर की शिवेश्वर जी और उनके पिता आज रिक्शा से घर जाने वाले हैं.. हर्षातिरेक में रिक्शावाला बोलता है।
पुराने दिनों की चर्चा करते हुए दोनों घर पहुँचते हैं और शिवेश्वर जी बिना देखे झटके में सौ का नोट निकाल कर रिक्शेवाले को देकर आगे बढ़ जाते हैं।
साहब ये बोल रिक्शावाले ने शिवेश्वर जी को रोकने की कोशिश करता है।
तुम लोग की यही दिक्कत है थोड़ा प्यार से बोल दो तो सिर पर आकर बैठ जाते हो.. इससे ज्यादा लोगे.. लूट मचा रखी है.. जाहिल.. गँवार और जाने किन किन शब्दों से रिक्शेवाले को विभूषित करते हुए शिवेश्वर जी चीखने लगते हैं।
अरे क्या हुआ क्यूँ चीख रहे हो.. दीनदयाल जी जो कि अंदर चले गए थे.. शिवेश्वर जी की गुस्से भरी आवाज सुनकर बाहर आते हैं।
देखिए ना बाबु जी रास्ते में थोड़ा प्यार से क्या बोल दिया.. चढ़ा ही जा रहा है और पैसे चाहिए इनको.. शिवेश्वर जी अपने पिता दीनदयाल जी से बोलते हुए क्रोधित दृष्टि रिक्शेवाले पर डालते हैं।
क्यूँ भाई.. सौ रूपए तो बहुत हैं दूरी के अनुसार.. दीनदयाल जी उस रिक्शेवाले से कहते हैं।
नहीं साहब जी.. हमारे तो पचास रूपए ही बनते हैं.. हम तो साहब से यही कहने कोशिश कर रहे थे कि उन्होंने ज्यादा दे दिए हैं और हमारे पास खुल्ले नहीं हैं.. वो पचास का नोट दे दें.. रिक्शावाला रूंआसा होकर कहता है।
तब शिवेश्वर जी का ध्यान रिक्शेवाले के हाथ पर जाता है.. झूठा कहीं का.. सौ का नोट उसके हाथ से झपटते हुए शिवेश्वर जी कहते हैं और पचास का नोट निकाल कर देते हुए दनदनाते हुए अंदर चले जाते हैं और उनके साथ उनका बारह साल का बेटा जो चीख पुकार सुनकर बाहर आया था.. वो भी अंदर जाकर पिता और दादा जी के साथ सोफ़े पर बैठ जाता है।
देखा ना बाबु जी उसे.. शिवेश्वर जी जो अभी भी लाल पीले हो रहे थे.. बोलते हैं ।
हाँ बेटा देखा.. आज वो समझ रहा होगा कि माँ सरस्वती के पुत्र अगर ऐसे होते हैं तो उसने पढ़ाई ना करके कोई गलती नहीं की। वो तो अध्ययन, अध्यापन और अध्यापक तीनों की इज्जत कर गया। वाणी तो हमारी जाहिलों जैसी है और शायद इसी का नतीजा है कि माँ सरस्वती ने आज भी हमें विनम्रता का वरदान नहीं दिया। बेटा जाहिल वो नहीं हम हैं। आज मैंने अपना अक्स अपनी परछाईं तुझमें देखी बेटे। जब तुम्हारी माँ मुझे गाली गलौज करने.. दूसरों का अनादर करने से रोकती थी तो अहम् में चूर मैं उसकी बात काट कर डांट देता था.. अपनी पत्नी के हार चढ़े तस्वीर को देखते हुए दीनदयाल जी कहते हैं। तू भी तो वही करता है बेटा.. देर हो जाए… तेरे बेटे में तुझे अपनी ये परछाईं नजर आने से पहले खुद को बदल डाल। हम हमारी महत्वाकांक्षा में आज तक हमारी खामियाँ नहीं देख सके। आज सारा अहं चकनाचूर हो गया.. पढ़े लिखे जाहिल शब्द जैसे शब्द हम जैसों के लिए ही बने होंगे। बेटा आज के दिन माँ शारदे के आगमन के दिन प्रण ले ले कि खुद में बदलाव लाएगा.. ईश्वर के बंदों का चाहे वो कोई हो.. उनका सम्मान करेगा…यही मेरा और तुम्हारा दोनों का प्रायश्चित होगा.. भर्राई आवाज में बोलते हुए दीनदयाल जी उठकर माँ सरस्वती की तस्वीर के समक्ष हाथ जोड़ प्रार्थना की मुद्रा में खड़े हो जाते हैं।
आरती झा(स्वरचित व मौलिक)
दिल्ली
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