“संस्कार से चलने वाली सम्मान की रक्षा करती हूँ।
संस्कृति धर्म निभाने में कर्म सर्वोपरि रखती हूँ।
मैं सृजनकारी जननी हूँ, अर्धागंनि कहलाती हूँ।
अधरो पर मुस्कान सज़ा, हर कर्तव्य निभातीं हूँ।
हर कार्य में तत्पर रहती, खुद के लिए है वक्त नहीं।
          संपूर्ण बनाती हूँ सबको, 
       मैं चाहूँ ताज ओ तख्त नहीं।।
हर लड़ाई की जड़ नारी, देते मुझको दोष सभी।
            किसी पुरुष ने मुझे बताओ, 
            मानी है अपनी खोट कभी?
               
              भ्रूण हत्या की दोषी हूँ या 
            बाल विवाह मैंने ख़ुद से किया?
            क्या सती प्रथा को बोलो तुम,
             मैंने ख़ुद से ही अंजाम दिया??
               अहिल्या के रूप मेंं बोलो, 
             क्या मैंने धोखा नहीं खाया है।
                 या सीता बन आंचल में, 
                 ख़ुद मैंने दोष लगाया है।।
            सुरपति का पाप न जान सकी
            पति समझ समर्पण कर बैठी।
             पत्नी का धर्म निभाने को मैं
              तन मन अर्पण कर बैठी।।
दामिनी बन सड़कों पर चीखी और चिल्लाई भी,
चार वर्ष की आयु में अस्मत अपनी लुटाई भी।
              कभी वस्त्रों पर प्रश्न उठाते 
              तो कभी मेरे व्यवहारों पर।
              हर कष्ट सहूं ? उफ़ न करूं  
   फिर भी सवाल उठते हैं सिर्फ़ विचारों पर।
हर नर दैत्य समान नहीं, न दोष मुक्त हर नारी है।
            लेकिन यह कड़वा सच भी है, 
                दोषी हर अत्याचारी है।।
                कभी पड़ोस में हुई लड़ाई 
                टीवी का वॉल्यूम बढ़ता है
               दूसरों के मामले में क्यों बोलूं, 
                सवाल यही मन में उठता है।।
                किसी शराबी के हाथों को 
               क्या किसी पुरुष ने रोका है।
               या गाली देती हर जुबान को, 
                 कभी किसी ने टोका है।।
कह दो आज़ मेरे मन के क्या प्रश्न सभी ये झूठे हैं।
क्यों नारी की हर बातों से अपने रहते सब रूठे हैं।
तुमने भी देखा जब रानी लक्ष्मीबाई लड़ी हुई।
         पौरुष दिखला कर वह नारी, 
          सारे ही नरों से बड़ी हुई।।
      जब जीत में तुमने ताली दी तो,
    संघर्षों में पांव क्यों पीछे मोड़ लिया।
         माँ जानकी पर उठा सवाल,
    तो जंगल में जा क्यों छोड़ दिया।।”
            अम्बिका झा ✍️
“संस्कार से चलने वाली सम्मान की रक्षा करती हूँ।
संस्कृति धर्म निभाने में कर्म सर्वोपरि रखती हूँ।
मैं सृजनकारी जननी हूँ, अर्धागंनि कहलाती हूँ।
अधरो पर मुस्कान सज़ा, हर कर्तव्य निभातीं हूँ।
हर कार्य में तत्पर रहती, खुद के लिए है वक्त नहीं।
          संपूर्ण बनाती हूँ सबको, 
       मैं चाहूँ ताज ओ तख्त नहीं।।
हर लड़ाई की जड़ नारी, देते मुझको दोष सभी।
            किसी पुरुष ने मुझे बताओ, 
            मानी है अपनी खोट कभी?
               
              भ्रूण हत्या की दोषी हूँ या 
            बाल विवाह मैंने ख़ुद से किया?
            क्या सती प्रथा को बोलो तुम,
             मैंने ख़ुद से ही अंजाम दिया??
               अहिल्या के रूप मेंं बोलो, 
             क्या मैंने धोखा नहीं खाया है।
                 या सीता बन आंचल में, 
                 ख़ुद मैंने दोष लगाया है।।
            सुरपति का पाप न जान सकी
            पति समझ समर्पण कर बैठी।
             पत्नी का धर्म निभाने को मैं
              तन मन अर्पण कर बैठी।।
दामिनी बन सड़कों पर चीखी और चिल्लाई भी,
चार वर्ष की आयु में अस्मत अपनी लुटाई भी।
              कभी वस्त्रों पर प्रश्न उठाते 
              तो कभी मेरे व्यवहारों पर।
              हर कष्ट सहूं ? उफ़ न करूं  
   फिर भी सवाल उठते हैं सिर्फ़ विचारों पर।
हर नर दैत्य समान नहीं, न दोष मुक्त हर नारी है।
            लेकिन यह कड़वा सच भी है, 
                दोषी हर अत्याचारी है।।
                कभी पड़ोस में हुई लड़ाई 
                टीवी का वॉल्यूम बढ़ता है
               दूसरों के मामले में क्यों बोलूं, 
                सवाल यही मन में उठता है।।
                किसी शराबी के हाथों को 
               क्या किसी पुरुष ने रोका है।
               या गाली देती हर जुबान को, 
                 कभी किसी ने टोका है।।
कह दो आज़ मेरे मन के क्या प्रश्न सभी ये झूठे हैं।
क्यों नारी की हर बातों से अपने रहते सब रूठे हैं।
तुमने भी देखा जब रानी लक्ष्मीबाई लड़ी हुई।
         पौरुष दिखला कर वह नारी, 
          सारे ही नरों से बड़ी हुई।।
      जब जीत में तुमने ताली दी तो,
    संघर्षों में पांव क्यों पीछे मोड़ लिया।
         माँ जानकी पर उठा सवाल,
    तो जंगल में जा क्यों छोड़ दिया।।”
            अम्बिका झा ✍️
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