अपने अपने कर्मों का फलदान
स्वर्ग नरक का यही होता भान
सभी चाहते हम इसी जीवन में
कैसे क्यों न बन जाये श्रेष्ठ महान
इच्छाओं की पूर्ति करने यहां
बेचे भी देते सरे बाज़ार ईमान
इंसानियत को रख ताक पर
निःसंकोच ले भी लेते है जान
अर्थ का अनर्थ बनाते व्यर्थ की
बातों में ही सदा उलझता ये जहान
जो रखता दिल को पाक और साफ
ये दुनिया उसे सदा ही लगती वरदान।
स्वरचित
शैली भागवत ‘आस’
