क्या लिखूं कैसे लिखूँ,
अन्तस्थ है मेरा रुधा हुआ,
शब्द बहुत कलम स्थिर,
एक संकोच बना हुआ।
कैसा बिछुड़न है जो न होकर भी,
 है सासों में भिधा हुआ।
 कितनी मुस्कुराहटें होंठो पर,
 तेरे कन्धे से लगके रोने को एक आसूँ रुका हुआ।
शायद हम न कह पाएं  शायद तुम न समझ सके,
मन के किसी गहरे कोने में है जज्बा कोई छुपा हुआ।
 कितना भी दिखा दो दुनिया को अपनी मजबूती,
दर्द की गहरी चोटों से मन का किला ढहा हुआ।
कहाँ ढूढे कोई बता दो बीते पलों को,
 छोड़ गया  भीनी खुशबू वो लम्हा हवा हुआ।
सावन, पतझड़ सब आए बारी बारी,
पर न लौटा वो वक्त जो चला गया।
झर झर गिरते आँखों से आसूँ,
कितना अचरज दर्द ही दिल की दवा हुआ।
 मन का मासूम परिंदा,कंक्रीट पर चलना सीख गया,
अचंभित परिवर्तन देख  मुस्कराके अतीत खड़ा हुआ।
 अन्जू दीक्षित,
उत्तर प्रदेश।
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