आज ‘रश्मिरथी’ ने दैनिक लेखन के लिए विषय दिया है-‘आपबीती’ तो साथियों वही हुआ न जो कुछ हमारे जीवन में घटित हुआ हो उसका सच्चा विवरण, तो लीजिए मैं आज आपको अपने जीवन के कुछ आह्लादित करने वाले सच्चे संस्मरण से अवगत कराती हूँ -: ‘बिल्ली रानी बड़ीसयानी,
पीती दूध बताती पानी।
पता नहीं कब, किसने और कैसे ये कहावत ईजाद की होगी?पर ऐसा होता बिलकुल नहीं। सच तो यह है कि इंसान को छोड़कर दूसरा कोई भी जीव झूठा,धोखेबाज और एहसान फरामोश कभी नहीं होता। वह हमेशा नेकनियती, प्रेम और अपनत्व का जवाब उसी तरह अपितु उससे बढ़कर ही देता है। ये सुनी सुनाई बात नहीं अपितु स्वयं का अनुभव कहता है।
बहुत से लोग बिल्ली को अपशकुनी मानते हैं पर ऐसा नहीं है।यदि आपने उसे प्यार-दुलार दिया है तो वह अंतिम सांस तक आपका भला ही चाहेगी।
मेरे पास बिल्लियों की कई-कई जेनरेशन रही है।बड़े खूबसूरत अनुभव दिए हैं उन्होंने। न जाने कितने संस्मरण बसे हुए हैं मेरे स्मृति-कुंज में।
चलो आज एक बांट ही लेती हूँ आप सब के साथ-
मेरे पास बिल्ली प्रजाति के चीकू और मीकू नाम के भाई बहन थे और थीं उनकी माँ औ मौसियां तथा थे अगली पीढ़ी के मीकू के दो छोटे छोटे बच्चे रीतू व प्रीतू।
इस तरह था उनका प्यारा सा सुन्दर परिवार। हमारा घर आंगन चौबारा उन सबके लिए अभयारण्य स्वरूप था वे सब कहीं भी उछलते-कूदते, सोते-जागते,निश्चिन्त विचरते पाए जा सकते थे।हमारी मोना(डाॅगी) उनकी लीडर थी।
सर्दियों के एक अपराह्न की बात है चबूतरे पर सब चैन की नींद सो रहे थे, धूप की गरमाई थी फिर भी छोटे बच्चों की वजह से मैंने उन्हें बोरी से उढ़ाकर ढक दिया था।मोना रानी अन्दर अपनी रजाई में आराम फरमा रही थीं। हमलोग भी लान में ही थे और हमारे बच्चे भी आस पास ही खेल रहे थे। मेरा बेटा भी खेलता हुआ पीछे से आया। उसे बिल्लियों को ढका देख शैतानी सूझी और उसने वहीं पर चबूतरे के पास खड़े होकर बड़ी बिल्ली के लड़ने की आवाज की मिमिक्री कर दी, जिसे सुनकर सोते सोते मीकू ऐसी चौंकी कि उछल कर उल्टी चबूतरे से नीचे गिरी और सबको हँसते देख सकपका गई।
बेटे ने ही फौरन गोद में बैठा कर उसे प्यार-दुलार किया और उसके बच्चों के पास छोड़ा। तब कहीं जाकर संतुलित हुई वह।
और बताऊँ आपको कि बिल्ली की चार जेनरेशन कभी भी साथ-साथ नहीं रहती अतः चौथी जेनरेशन के जन्म लेते ही प्रथम पीढ़ी उस स्थान से दूर हो जाती है,खासकर मेल मेंबर्स। बस प्यार-मोहब्बत दिखाने कभी-कभार मेहमानी में आ जाते हैं। एक समय ऐसा आया कि चीकू मास्टर को घर छोड़कर जाना पड़ रहा था। बड़े दुःखी मन से चले तो गए पर जब तब आते तो चौराहे से ही शोर मचाते आते सारी कॉलोनी वाले जान जाते कि मिसेज श्रीवास्तव का चीकू आ रहा है और जब तक मेरे साथ बैठकर लाड़ प्यार न करवा लेते तबतक चुप न होते। अपने काले-काले मुखड़े से लाल-लाल जीभ निकाल कर बोलते ही रहते। खाने पीने से कोई मतलब नहीं होता, बहुत मनुहार करने पर धन्यवाद स्वरूप थोड़ा सा कुछ खा ओंठो पर जीभ फिरा पूँछ हिलाते हुए चले जाते।
ऐसा मधुर स्मरणीय संग-साथ होता है इन बेजुबान कहे जाने वाले मनोहारी प्रेम-सौहार्द से संलिप्त जीवों का। जो आज भी मेरी आँखो को नम करने और ओठों पर मुस्कान लाने की क्षमता रखता है।
लेखिका-
सुषमा श्रीवास्तव,
रुद्रपुर, उत्तराखंड।
मौलिक रचना, सर्वाधिकार सुरक्षित ।
