” मदालसा । यह किस तरह की बहकी बहकी बातें कर रही हों। हमारा प्रेम हमारा ही विषय है। हमारे प्रेम की सकरात्मक परिणति संसार में किसी के भी दुख का तो विषय नहीं है। फिर क्षत्रिय राजकुमारों द्वारा अपनी रुचि से जीवन साथी चुनने की पुरानी परिपाटी रही है। इसमें किसी को भी कोई आपत्ति नहीं होगी। “
  राजकुमार ऋतुध्वज उस बात को समझ नहीं पा रहा था कि किस तरह उसके जीवन में मदालसा का आगमन राष्ट्र और समाज के हित में नहीं रहेगा। जिस तरह प्रेम एक व्यक्तिगत विषय है उसी तरह विवाह भी एक व्यक्तिगत व्यवस्था है। किसी के विवाह का पूरे राष्ट्र से किस तरह संबंध हो सकता है। 
   मदालसा वह देख रही थी जो राजकुमार देखकर भी नहीं देख पा रहा था। सत्य तो यही था कि वह पातालकेतु की कैद में रहकर भी कब कैद थी। फिर भी इस तरह कैदी के रूप में जीवन व्यतीत करने के पीछे का कारण सम्मान की चाह ही तो थी जो कि बहुधा अपहृता कन्याओं को नहीं मिलता। अक्सर समाज भी अपहृता कन्याओं को अभीष्ट सम्मान नहीं देता है। 
   ” राजकुमार। क्या यह सत्य नहीं कि मैं एक अपहृता कन्या हूं। दुष्ट पातालकेतु की कैद में हूं।” 
  ” जानता हूं मदालसा। और आज से आप इस कैद से मुक्त भी हो चुकी हो।” 
  ” फिर एक अपहृता को अपने जीवन में स्थान देकर आप समाज का किस तरह सामना करेंगें। नहीं राजकुमार। समाज का सामना करना कभी भी आसान नहीं होता। बहुधा समाज किसी के दोष का दंड किसी और को देता है। बहुत बड़े ज्ञानी भी उस समाज का प्रतिकार नहीं कर पाते। “
” मदालसा। यदि मेरा आपके प्रति प्रेम कोई असत्य नहीं है तो सत्य यह भी है कि मैं आपको अपनी जीवन संगिनी बनाकर कभी भी अकेला नहीं छोड़ूंगा। मनुष्य जीवन किसी न किसी तरह निर्वाह कर ही लेता है। मेरा प्रेम मेरा पथ प्रशस्त करेगा। राजकुमार या राजा बनने की मुझे कोई इच्छा नहीं है। “
” हाॅ राजकुमार। इसी लिये तो हमारा मिलन एक तूफान ला देगा। एक राजकुमार जो कि भविष्य का राजा बनने के लिये धरती पर आया है, एक स्त्री के लिये अपने कर्तव्यों को त्याग सकता है। सही बात तो यही है कि राजपरिवार में जन्म लेने बालों का कुछ भी निजी नहीं होता है। राजा केवल प्रजा के सुख में सुखी होता है और प्रजा के दुख से दुखी। बहुत संभावना है कि हमारा मिलन राष्ट्र से एक कुशल युवराज को छीन ले। बहुत संभावना है कि इस मिलन की परिणति कुछ इस तरह हो कि एक भविष्य का राजा अपने कर्तव्यों को तिलांजलि दे दे। नहीं राजकुमार। हमारे प्रेम की यह परिणति तो अभीष्ट नहीं। हमारा मिलन आपके राष्ट्र के हित में तो नहीं। “
   राजकुमार एक क्षण शांत रह गया। सचमुच क्या उसका एक कन्या के प्रेम में अपने राजधर्म का त्याग कर देना उचित रहेगा। फिर क्या वह मदालसा को कभी भुला पायेगा। दोनों ही पक्ष अपने स्थान पर उचित हैं। कहीं कोई राह नहीं दिखाई देती। शायद यही धर्म संकट की अवस्था है। 
   तभी उस कक्ष में एक दिव्य प्रकाश उदित हुआ। सामान्य होते होते कुलगुरु तुंबुर प्रत्यक्ष थे। तपस्वियों के लिये कोई भी रहस्य कब अज्ञात होता है और कोई भी स्थल कब अगम्य होता है। अपनी साधना के प्रभाव से सूक्ष्म शरीर रख वे कहीं भी पहुंचने में सक्षम होते हैं। 
  ” साधु। साधु। खुद के हित की इच्छा तो सभी को होती है। पर जो खुद से बढकर राष्ट्र को समझे, वही राष्ट्र का उचित नैत्रत्व करता है। पुत्री मदालसा। हमारे राष्ट्र की रानी बनने के सारे गुण आपमें मौजूद हैं। सत्य तो यही है कि आपसे बेहतरीन रानी बनने की क्षमता किसी अन्य कन्या में नहीं है। भले ही प्रेम व्यक्तिगत विषय है। पर राष्ट्र हित में आपका विवाह राजकुमार ऋतुध्वज से अभी होगा। मेरे चयन पर राज्य में किसी को भी कोई आपत्ति नहीं होगी। फिर अब विषाद छोड़िये। राजकुमार ऋतुध्वज के साथ परिणय बंधन में बंधने के लिये तैयार हो जाइये। “
    गुरुदेव ने अग्नि प्रज्वलित की। कुण्डला ने राजकुमार और मदालसा के वस्त्रों में परिणय गांठ बांध दी। गुरुदेव के आदेश को अस्वीकार करने का कोई प्रश्न न था। शीघ्र ही विभिन्न मंत्रों के उच्चारण के साथ और अग्निदेव के सात फेरे लेकर राजकुमार और मदालसा परिणय बंधन में बंध गये। 
   ” राजकुमार ऋतुध्वज। मेरा आशीष है कि आप असुरों पर विजय प्राप्त करेंगें। असुरों का वध कर सभार्या अपने देश वापस आयेगें। मैं आपकी प्रतीक्षा करूंगा ।” 
   आशीर्वाद देकर गुरुदेव तुंबुर अदृश्य हो गये। निश्चित ही गुरुदेव उनके विवाह की जानकारी उनके पिता को अवश्य दे देंगें। 
   कुण्डला के लिये पहले भी कोई पथ अगम्य न था। वह शीघ्र ही निमिषारण्य के लिये चल दी। राजकुमार ऋतुध्वज और मदालसा दोनों ही कुवलय पर आरूढ हो असुर नगरी की गलियों में निर्भीक होकर भ्रमण कर रहे थे। मानों कि दोनों ही असुरों को दिखाना चाहते हों कि यथार्थ प्रेम कोई जबरदस्ती से प्राप्त करने बाली कोई वस्तु नहीं है। यथार्थ प्रेम वास्तव में समर्पण है। यथार्थ प्रेम वास्तव में सम्मान देना है। यथार्थ प्रेम वास्तव में कर्तव्य और अधिकारों का संतुलन है। फिर नारी का प्रेम कभी भी उसे अपहृत कर नहीं पाया जा सकता है। शुद्ध प्रेम हमेशा मन की गहराई से उठता है। एक शुद्ध प्रेम की जबरदस्ती के प्रेम पर विजय की झांकी देख भी असुर सच्चे प्रेम के स्वरूप को कितना समझे, कहा नहीं जा सकता। 
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
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