मुकम्मल ये सारा जहां नही होता,जब सर पर साया माता- पिता का नही होता,
भीड़ मे भी नज़र  आती है तन्हाई,
खुशियो मे भी दिख जाती है अक्सर रुसवाई,
सुबह की धूप भी लगती है अल्साई,
जब तक हर सुबह में प्यार माता-पिता का नही होता!
कहने को तो सारा जहां  ही अपनी- अपनी जगह है,
चांद तारे आसमां भी अपनी -अपनी जगह है,
वो ही शहर है वो ही गली, घर भी अपनी जगह है,
पर अब वो घर आंगन से प्यार का बुलावा माता-पिता का नही होता!
खुशी की रोशनी को भी ढक लिया गम के अंधियारो ने,
फर्ज का अब रूप ले लिया अपने अधिकारो ने,
फुर्सत ही कहां जो अब सोचे सिर्फ अपने बारे मे,
अहसास अब वो हो गया जो रहने पर माता-पिता के नही होता!
सच ही है मुकम्मल ये सारा जहां नही होता,
जब सर पर साया माता-पिता का नही होता!
                                                 श्वेता अरोड़ा
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