प्रेम और निष्ठा मन का विषय है।जबरदस्ती कोई प्रेम पैदा नहीं कर सकता है। फिर प्रेम को निरूपित करने बाले बड़े बड़े नियम सभी अपना भी नहीं सकते। यदि उन नियमों को जबरन अपनाने के लिये बाध्य किया जाता है, उस समय  मन प्रेम की अवधारणा को और भी तेजी से तिलांजलि देने लगता है। 
   किसी स्त्री का किसी एक ही पुरुष से आजीवन प्रेम करना एक स्त्री प्रेम की सर्वोच्च अवधारणा है। तथा इस अवधारणा को जीवन में उतारना प्रत्येक के वश की बात नहीं है। सतीत्व और वैराग्य की अवधारणा प्रत्येक के लिये नहीं बनी हैं। 
   माना जाता है कि भारत में विधवा पुनर्विवाह की अवधारणा आधुनिक युग की है। पर यह सत्य नहीं है। प्राचीन भारत में भी विभिन्न जातियों और समाजों में विधवा स्त्री द्वारा पुनर्विवाह की परिपाटी थी। हालांकि ऐसे अधिकांश समाजों में विधवा का विवाह उसके दिवंगत पति के छोटे भाई से ही होता था। रामायण काल में भी वानर समाज तथा राक्षस समाज में यह परिपाटी मौजूद थी। 
   कभी अपने पति भक्ति के लिये असुर समाज में विख्यात रही रंभा अपने पति पातालकेतु के निधन के बाद उसके प्रेम में अपना जीवन न बिता पायी। अपने पति की यादों को अपने जीवन का सहारा न बना पायी। वैसे इसमें कुछ बुराई भी नहीं है। पर बुराई थी, रंभा द्वारा अपने देवर तालकेतु के पूनर्विवाह के बाद भी मन में स्वार्थ और द्वेष का त्याग न करना। अपने नवजीवन को संवारने के स्थान पर पुरानी ईर्ष्या के ज्वर में अपने मानस को दग्ध करते रखना। प्रेम तो उसे न पातालकेतु से था और न तालकेतु से। पर मदालसा के प्रति उठा वैमनस्य अभी तक जीवित था। पातालकेतु के निधन से भी अधिक दुख उसे मदालसा को सुखी जीवन की राह पर जाने पर हुआ। अभी भी वह मदालसा के प्रेम भरे जीवन की कल्पना में दुखी थी। स्वयं के जीवन को प्रेम की जलधारा से सिंचित करने के स्थान पर उसे मदालसा के सुखों को नष्ट करने की इच्छा रखने की मानसिक बीमारी हो गयी थी। पर तालकेतु इतना साहसी न था। वैसे मदालसा और कुण्डला के समक्ष पातालकेतु का साहस भी उत्तर दे चुका था। अंतिम क्षणों में वह राजकुमार ऋतुध्वज का सामना करने को भी तैयार न था। पर संभवतः तालकेतु अपने बड़े भाई से भी अधिक चतुर था। व्यर्थ के प्रवादों से बचना चाहता था। 
    तालकेतु पहले से विवाहित था। पर अपने बड़े भाई की विधवा को उसने अपनी व्याहता पत्नी से ऊपर स्थान दिया। उसकी विवाहिता पत्नी भी रंभा को पर्याप्त सम्मान देती थी। पर रंभा को इस सम्मान में भी अपार पीड़ा होती। बार बार उलाहना देने पर भी तालकेतु द्वारा उसके मनोरथ सिद्ध करने के उपाय पर चर्चा भी नहीं करना, केवल यही तो सिद्ध करता है कि वास्तव में इस संबंध में कोई प्रेम ही नहीं है। 
   रंभा द्वारा अपने पति प्रेम का दिखावा अभी भी जारी था। अब वह तालकेतु से सबसे अधिक प्रेम करने बाली पत्नी का दिखावा कर रही थी। कहीं से करवा व्रत की जानकारी होने पर उसने भी उपवास रखा। पर यह उपवास भी पति प्रेम के लिये न था। यह उपवास भी उसके उद्देश्य पूर्ति का साधन बन रहा था। 
   तालकेतु प्रथम बार सत्य समझ न पाया। प्रथम बार उसे रंभा के गहरे प्रेम का अनुमान हुआ। भले ही वह व्यवहार में रंभा को प्रथम पत्नी दिखा रहा था। पर प्रथम बार उसके मानस में भी रंभा प्रथम पत्नी के पद पर स्थापित हो गयी। 
   धीरे धीरे रंभा तालकेतु से अपने मन के मनोरथ पूर्ण कराने लगी। धीरे-धीरे उसके लक्ष्य बढते गये। धीरे-धीरे वह तालकेतु को अपने वश में करती गयी। और एक दिन धीर से उसने तालकेतु से वह मांग लिया जिसकी तालकेतु अभी तक अवहेलना करता रहा था। आज रंभा के प्रेम के भ्रम में तालकेतु को एक निर्दोष कन्या के जीवन के अंत का उपक्रम रचने में कोई भी बुराई नहीं लग रही थी। आखिर इसमें बुरा ही क्या है। शत्रु के अंत से ही शत्रुता का अंत होता है। जब तक शत्रु जीवित है, मन असंतुष्टि के भंवर से निकल ही नहीं पाता। पराजय का दंश मन को बार बार विदीर्ण ही करता है। ऐसे में विभिन्न भोग भी मन को संतुष्ट नहीं कर सकते। 
  रंभा भले ही भाई की विधवा हैं पर अब मुझसे विवाह कर मेरी पत्नी बन चुकी हैं। मेरे प्रेम में कठिन उपवास रखती है। फिर उनके मन को प्रतिपल कष्ट पहुंचाती मदालसा का वध आवश्यक है तथा यह रंभा के प्रेम का ही प्रतिफल होगा। 
    कई बार सत्य और असत्य इस तरह मिल जाते हैं कि उनमें विभेद करना संभव नहीं होता। रंभा के प्रेम का प्रतिफल देने की लालसा में तालकेतु को अपनी पत्नी का रोकना और सलाह देना अखर रहा था। वैसे भी वह इसे सौतिया दाह ही समझ रहा था। सही बात तो यह थी कि प्रदर्शन का प्रभाव कुछ इस तरह पड़ा था कि उसे अपनी व्याहता का सत्य प्रेम भी असत्य लग रहा था और रंभा का असत्य पूर्ण सत्य लग रहा था। एक उपवास के छलावे में सच्चा प्रेम अपने अस्तित्व को भी सिद्ध नहीं कर पा रहा था। तथा पति को बुराई से रोकना भी प्रेम का एक रूप है, जैसी अवधारणा को तालकेतु स्वीकार करने की स्थिति में न था। 
    पाखंड को सत्य पर वरीयता देने के बाद भी तालकेतु सीधे सीधे राजकुमार ऋतुध्वज का सामना करने की स्थिति में न था। फिर एक गहरे षड्यंत्र की पृष्ठभूमि तैयार की गयी। 
    दूसरी तरफ राजकुमार ऋतुध्वज और मदालसा के संयोग का कारण पवित्र प्रेम भी उस षड्यंत्र के फलीभूत होने की प्रतीक्षा देख रहा था। षड्यंत्र के माध्यम से भी सच्चे प्रेम के विस्तृत स्वरूप को संसार के समक्ष लाने की तैयारी कर रहा था। सत्य ही है कि आपदा केवल कठिनाइयों का ही जन्म स्थल नहीं होतीं अपितु आपदा ही व्यक्ति के संकल्प को निखारकर उसे आभा बिखरते चमचमाते स्वर्ण बनाने बाली भट्टी भी होती है। प्रेम उसी षड्यंत्र का सहारा लेकर एक ऐसी प्रेम गाथा के निर्माण की तैयारी कर रहा था जबकि कहा जा सके कि एक पुरुष का प्रेम भी एक स्त्री के प्रेम को बराबर की टक्कर दे सकता है। स्त्रियों की भांति एक पुरुष भी अपनी प्रेमिका की यादों को अपने जीवन का आधार बना सकता है। 
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
Spread the love

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *