भगवान शिव का आशीर्वाद फलीभूत हुआ। महाराज अश्वतर की पत्नी के गर्भ से एक सुंदर कन्या ने जन्म लिया। देखने में वह मदालसा की ही भांति प्रतीत हो रही थी। महाराज अश्वतर ने उस कन्या का नाम मदालसा ही रखा।
समय के साथ साथ मदालसा की आयु बढने लगी। कभी कभी वह कुछ ऐसी बातें भी कह देती थी जिनका संबंध राजकुमार ऋतुध्वज की पत्नी मदालसा से होता था। सही बात तो यही थी कि महाराज अश्वतर की पुत्री मदालसा, राजकुमार ऋतुध्वज की पत्नी मदालसा का ही तो पुनर्जन्म थी।
एक दिन महाराज अश्वतर अपने दोनों पुत्रों सुजान और कापाली के साथ साथ अपनी पुत्री मदालसा को लेकर महाराज शत्रुजित से मिलने चल दिये। महाराज शत्रुजित ने जब छोटी सी बालिका को देखा तो बरबस अपनी पुत्रवधू मदालसा का स्मरण हो आया। बालिका को उन्होंने प्रेम से अपनी गोद में बिठा लिया।
” सचमुच महाराज। संसार में सुखी तो वही है जो कि एक पुत्री का पिता हो। इस आयु में भी आपको यह आनंद मिला। सचमुच आप बधाई के पात्र हैं। मेरे विषय में तो लगता है कि ईश्वर ही विमुख हैं। मदालसा को हमेशा अपनी पुत्री माना और वह पुत्री भी हम सभी को छोड़ चली गयी।”
महाराज शत्रुजित को मदालसा की स्मृति हो गयी। कुछ क्षण वह अपने नैत्र बंद किये रहे। महाराज अश्वतर को लगा कि अब उन्हें सत्य बता देना चाहिये। फिर उन्होंने भगवान शिव के वरदान से कन्या प्राप्ति की पूरी बात महाराज शत्रुजित को बतायी। इस समय महाराज जिस कन्या को स्नेह कर रहे हैं, वह उनकी पुत्रवधू मदालसा ही है।
महाराज ने मदालसा से कुछ बातें पूछीं। उन्हें विश्वास हो गया कि यह कन्या ही उनकी पुत्रवधू मदालसा है। मदालसा को उन्होंने महारानी के पास राजमहल में भेज दिया। जल्द ही महारानी को भी इस कन्या के विषय में विश्वास हो गया कि यह उनकी पुत्रवधू मदालसा ही है।
विश्वास के बाद मन और अधिक विषाद से भर गया। यदि यही अपने पति की मृत्यु की सूचना सुन अपने प्राण त्याग देने बाली उनकी पुत्रवधू मदालसा है तो इस जन्म में यह किस तरह अपनी गृहस्थी में सुखी रहेगी। एक बालिका और पूर्ण युवा राजकुमार का मिलन तो संभव नहीं लगता।
पर महाराज अश्वतर इस विषय में अधिक निश्चिंत थे। उन्होंने मदालसा को अपनी पुत्री के रूप में इसी लिये तो प्राप्त किया है ताकि वह उसका विवाह राजकुमार ऋतुध्वज से कर सकें। मन में प्रेम होने पर आयु का अंतर भी कोई अंतर नहीं रहता ।मदालसा इस संसार में वापस राजकुमार का साथ पाने के लिये ही तो आयी है।
प्रजा कार्य में लगे राजकुमार ऋतुध्वज को वापस आने में समय लगा। ऐसी अद्भुत बातों को आसानी से सही नहीं माना जाता है। संभावना थी कि उसके पिता और उसके मित्रों के पिता इस तरह उसका विवाह करने की योजना बना रहे हैं। वह भी एक अबोध बालिका के साथ। जबकि वह तो पूरा जीवन मदालसा की यादों को समर्पित कर चुका है।
पर जब बालिका ने राजकुमार को कुछ ऐसी बातें बता दीं जिन्हें पति और पत्नी के मध्य की गुप्त बातें माना जाता है, फिर राजकुमार शांत हो गये। उन्हें विश्वास हो गया कि उनकी जीवन संगिनी मदालसा एक बार फिर से उनके जीवन में साथ देने के लिये वापस धरती पर आयी है।
एक बार फिर राजकुमार और मदालसा के विवाह का आयोजन किया गया। महाराज अश्वतर ने मदालसा का कन्या दान किया। राजकुमार ऋतुध्वज और नागदेश की राजकुमारी का भविष्य सुनिश्चित हो गया।
कुछ दिनों महाराज अश्वतर महाराज शत्रुजित के राज्य में रुके। इतने समय छोटी सी वधू महारानी के साथ रही। आखिर महाराज अश्वतर की विदा का समय आ गया।
निश्चित किया गया कि अभी नागदेश की राजकुमारी मदालसा अपने पिता के साथ वापस चली जायेगी। उचित समय पर उसे गौना कर बुलाया जायेगा।
सामान्य विद्याध्ययन के बाद मदालसा ने आयुर्वेद की शिक्षा प्राप्त करने की इच्छा व्यक्त की। पिता अश्वतर और भाइयों सुजान और कापाली ने उसकी इच्छा का सम्मान किया। मदालसा घर से दूर गुरुदेव धन्वंतरि के आश्रम में रहकर आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त करने लगी। कई वर्षों की कठिन साधना के बाद वह एक कुशल आयुर्वेद चिकित्सक बन गयी।
किशोरावस्था छोड़ एक बार फिर से मदालसा के जीवन में यौवन का आगमन हुआ। एक बार फिर से उसका मन प्रेम के आधीन हुआ। एक बार फिर से वह राजकुमार ऋतुध्वज की याद में तड़प रही थी। गौना कराने का ससुराल से कोई संदेश न मिलने से मन अधिक चिंता में पड़ गया। प्रेम और विश्वास एक दूसरे के पूरक होते हैं। पर सच्ची बात यह भी है कि प्रेम की अधिकता बहुधा संशय को भी जन्म देती है।
प्राण त्यागने के बाद जब मदालसा की आत्मा ऋतुध्वज की आत्मा का साथ ढूंढ रही थी, उसी समय उसे ऋतुध्वज के जीवित होने का आभास हो चुका था। फिर से राजकुमार ऋतुध्वज का साथ पाने को वह इस संसार चक्र में आयी। पर लगता है कि वह जिसके लिये संसार में पुनः आयी, उसे उसका कोई भान ही नहीं है। लोकाचार को ध्यान रखकर भी दो प्रेमियों का मिलन कब असंभव है जबकि दोनों ही परिणय बंधन में भी बंध चुके हैं।
मदालसा की ससुराल से गौना कराने का कोई संदेश नहीं आया। अपितु एक दिन खुद महाराज शत्रुजित महारानी के साथ गौना कराने आ पहुंचे। बिना कोई पूर्व सूचना दिये।
दूसरी तरफ गोमती तट के वासी एक बड़े उत्सव की तैयारी कर रहे थे। आखिर अब महाराज शत्रुजित ने राजकुमार ऋतुध्वज के राज्याभिषेक का निर्णय जो ले लिया था। वह खुद भावी महारानी मदालसा को लेने गये हैं। राजकुमार चाहकर भी अपनी प्रियतमा से मिलने न जा सके। आखिर एक भावी नरेश को इतना अधीर तो नहीं होना चाहिये। पिता की अनुपस्थिति में वह प्रजा का ध्यान रख रहे थे तथा राज्यभिषेक की तैयारी भी उन्हीं को करनी थीं। शांति से अपनी जिम्मेदारी निभाकर अपने मन में उमड़ रहे प्रेम के तूफान को शांत करने का प्रयास कर रहे थे।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
