बड़ी दूर से आवाज़ आई
मधम मधम सा स्वर गूँजा।
मधुर स्वर सुखद लहरी से
आज फिर आवाज़ दी।
सुखद अनुभूति का क्षण
पहचानी सी स्वर लहरी ।
अनजानी सी कुछ पहचानी
बहुत दिनों के बाद सुनी ।
तंद्रा भंग हुई सहसा ही
फिर बीता कल जाग गया।
परतें दर परतें खुलने लगी
हर बीता पल चलचित्र दिखा।
भूलना चाहा हर बीता पल
रह-रहकर नासूर बना।
छोड़ दिया जिन बातों को
कब्र तोड़ बाहर निकली ।
जिनसे दूर हुए वो ही अक्सर
टकरा कर सामने खड़े मिले।
एक आँधी धूल का बवंडर उड़ाती
एक रिश्तों का शमशान सजाती।
हाँ एक मद्धम सा स्वर सुना
कुछ जाना-पहचाना सा था।
——-अनिता शर्मा झाँसी
——-मौलिक रचना
