माता से लोरियों के माध्यम से कर्मयोग की शिक्षा पाये राजकुमार अलर्क कुशल युवराज सिद्ध हुए। प्रजा का भविष्य सुरक्षित था। पर खुद अलर्क का भविष्य। सांसारिक दृष्टि से वह देश का राजा बनेगा। सांसारिक दृष्टि से वह बड़े से बड़े संकटों को पार कर लेगा। सांसारिक दृष्टि से वह कठिनाइयों को भी मिटाकर खुशियों में बदलने में सक्षम रहेगा। पर क्या सांसारिक दृष्टि ही यथार्थ दृष्टि है। क्या वह जीवन मुक्त की अवस्था को प्राप्त कर लेगा। क्या वह महाराज जनक की भांति पूर्णतः कर्म करते हुए भी उनसे मुक्त रहेगा। क्या कर्मों के फल से खुद को बचा पायेगा। कहीं वह संसार चक्र में बंधा तो नहीं रह जायेगा।
   राजकुमार विक्रांत, सुबाहु और शत्रुमर्दन तीनों माता मदालसा से आज्ञा लेकर सन्यास की राह पर बढ गये। लगने लगा कि मदालसा कुछ हताश सा हो रही है। मन की पीड़ा अक्सर उसके चेहरे पर आ जाती। सचमुच एक माॅ की वेदना को समझ पाना अति कठिन है। जिस स्त्री के तीन पुत्र सन्यासी बन गये, क्या वह पुत्रों के भविष्य के कारण दुखी थी। अथवा जो विदुषी स्त्री अपने एक पुत्र को इच्छा होने पर भी रानी का धर्म निर्वहन करने के लिये वैराग्य का पाठ नहीं समझा पायी, वह अपने पुत्र के आध्यात्मिक भविष्य के लिये दुखी थी। 
   भोगों का स्वरूप ही कुछ प्रज्वलित अग्नि के समान होता है। भोग रूपी घृत डालते रहने पर लालसा रूपी अग्नि और अधिक प्रज्वलित ही होती है। 
   महाराज ऋतुध्वज भी एक विचित्र अवस्था से गुजर रहे थे। शरीर कमजोर होने लगा था। चेहरे की झुर्रियां और सर के श्वेत केश स्पष्ट व्यक्त कर रहे थे कि जल्द ही उन्हें अपने जीवन का प्रारूप बदलना होगा। पीढी दर पीढ़ी चली आ रही व्यवस्था का उन्हें भी पालन करना होगा। पर उस व्यवस्था को स्वीकार करने के लिये वह मन से तैयार न थे। इस अवस्था का कुछ दोष भोगों का भी था। पर सचमुच किसी भी भोग में ऐसी शक्ति न थी कि वह ऋतुध्वज जैसे परम संयमी का पथ रोक सके। पहले भी मदालसा के निधन के बाद उन्होंने परम संयमी का जीवन व्यतीत किया था। तथा यदि मदालसा पुनर्जन्म लेकर उनकी जीवन संगिनी न बनती तो वह पूरे जीवन ही वैसा ही जीवन जी लेते। जीवन की जिस आयु में मनुष्य विभिन्न भोगों की तरफ आकर्षित होता है, उस आयु में उन भोगों से खुद को दूर रखने में सक्षम महाराज ऋतुध्वज उनके पिता तथा अन्य पूर्वजों द्वारा अपनायी परंपरा का निर्वाह करने में भी असमर्थ थे। मदालसा के लिये यही प्रमुख दुख था। 
   मदालसा समझ रही थी कि यह महाराज की भोगों के प्रति लोलुपता तो नहीं है। सचमुच यह भी महाराज का मदालसा के लिये प्रेम था। 
   आदर्श गृहस्थ जीवन के लिये भले ही प्रेम सर्व प्रथम है। फिर भी अन्य विचार कहीं न कहीं अपना प्रभाव दिखाते हैं। पति और पत्नी की आयु में बहुत अधिक अंतर कभी भी अधिक स्वीकार नहीं किया जाता है। यही कारण महाराज ऋतुध्वज के कर्तव्य पथ का अवरोध था। भले ही जब ऋतुध्वज ने पातालकेतु का अंत कर जब मदालसा से विवाह किया था, उस समय दोनों हमआयु थे। पर इस समय रानी मदालसा, पूर्व मदालसा का पुनर्जन्म उनसे आयु में बहुत छोटी और वृद्धावस्था से बहुत दूर थीं। अपनी प्रिया को सन्यास के दुखों से बचाने के लिये महाराज ऋतुध्वज खुद को आगे के लिये प्रस्तुत नहीं कर पा रहे थे। 
  एक दिन, विषादाधिक्य में मदालसा अचेत थी। मदालसा के प्रेम में आजीवन अविवाहित रहने का निर्णय लेने बाले महाराज ऋतुध्वज उसे प्रकृतिस्थ करा रहे थे। पंखा झलते हुए भी उनके हाथ कांप रहे थे। 
मदालसा जब प्रकृतिस्थ हुई, महाराज के कमजोर हाथों को देख विचलित हो उठी। जिसे महाराज पुत्र विरह की वेदना समझ रहे थे। 
   वेदना में कौन ज्ञानी और कौन अज्ञानी। वेदना तो मन को छिन्न भिन्न कर देती है। परम विश्वासी को भी नास्तिकता की अवधारणा समझाने लगती है। ऐसा सभी के जीवन में कभी न कभी होता है। 
   कभी कभी यथार्थ में जो दिखाई देता है, वह सत्य नहीं होता।  वह स्त्री विकल थी जिसने अपने तीन पुत्रों को संसार से वैरागी बना दिया। क्या वह स्त्री अपने उद्देश्यों में सफल रही। कब रही। आखिर जो स्त्री अपने पति को वह सत्य न समझा पायी, वह सफल कब हुई। हाॅ सत्य है कि जो स्त्री अपने पति को संसार में बंधन से मुक्त न कर पायी, वह खुद समेत पूरे विश्व को मुक्त कर भी कब मुक्त हो पायी। 
   केवल खुद तक का चिंतन, यह तो किसी स्त्री का चिंतन नहीं है। पति प्रेम में अपने प्राण त्यागने बाली सती स्त्रियों के लिये भला क्या बंधन। अपने पति के प्रेम में प्राण त्यागने बाली उसके लिये पुनर्जन्म के रूप में यह बंधन क्यों। बंधनमुक्ता यदि फिर से बंधन में है तो केवल स्वेच्छा से ही तो। और वह स्वेच्छा भी क्या खुद के उद्धार की लालसा से। बिलकुल नहीं। पति के लिये अपने प्राणों का अर्पण करने बाली स्त्री का लालसा को संसार में कौन सही समझ पाया है। 
  फिर आज मदालसा किस तरह से अपने उद्देश्यों में सफल है। अपने उद्देश्यों में असफल रही मदालसा की आंखों से आंसुओं की बाढ आने लगी जिसमें महाराज ऋतुध्वज डूबने लगे। प्रयास कर भी उस अश्रुधारा से खुद को बाहर नहीं निकाल पा रहे थे। 
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
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