चीं चीं चीं चीं गान सुनाएँ,
चिड़िया यूँ हीं हंँसाती l
प्रकृति के सब रागों में वो ,
सुंगधित गूंँज धड़काती l
चीं चीं चीं चीं गान सुनाएँ,
चिड़िया यूँ ही हंँसाती l
पानी पीकर झूमें नाचे,
तराशी सारी पाखी हैं l
सरगम साज सजे हैं हरदम ,
जैसे गाएँ साखी हैं l
पवन वेग में उड़ती जाएँ,
सुनहरी पंखे फुदकाती l
चीं चीं चीं चीं गान सुनाएँ,
चिड़िया यूँ ही हँसाती l
साथी साथ उड़े गूँजे रे,
बलखाती शर्माती हैं l
पावन सपनें पंख पंख में,
सब हरदम ले चलती हैं l
धुन में अपनी उड़ती जाएँ,
प्रेम रंग ही बरसाती l
चीं चीं चीं चीं गान सुनाएँ,
चिड़िया यूँ ही हंँसाती l
कूँ – कूँ कर पीड़ा भूलाते,
मीठी वाणी रस घोले l
कहे सदा हमें अपने सपन,
सींचो ऊँचे विचार को l
घर आनंद सदा कर जाए,
अनुपम सजल छटा बिखराती l
चीं चीं चीं चीं गान सुनाएँ,
चिड़िया यूँ ही हंँसाती l
रचयिता
डॉ. ज्योति सिंह वेदी’येशु’
—–मधेपुरा (बिहार )——-
