बहुत याद आता है माँ का आँगन
जहाँ बीता था मेरा बचपन।
जिस आँगन में खेल बढ़े थे तब,
न सोचा था छूटेगा आँगन ।
जब-जब तुमने मुझे पुकारा था,
छोड़ सभी को दौड़ी आती थी।
आज जब जाती हूँ तब-तब,
आँखे भर नम हो जाती हैं।
वीरान सा लगता अब घर-आँगन,
जहाँ चहक-रौनक बसती थी।
तुमसे कितनी रौनक थी माँ घर में,
अब बस यादें और यादें साथ है।
चलचित्र की तरह दिखती हो आंखो में,
दिल में मेरे हमेशा बसती हो।
वो आँगन जहाँ मैं खेली कूदी,
अब स्वप्न तुल्य हुआ है।
माँ का आँगन,माँ का आँचल ,
सुखद अनुभूति का एक चित्र ।
आँगन में धूप तापना,गर्म चाय हमें थमाना,
सच माँ,याद बहुत आती हो।
ममता का एहसास साथ है ,पर…
माँ आँगन तो है,पर तुम कहाँ हो।
अब नहीं भाता वो आँगन माँ,
जहाँ साथ न तुम होती हो।
स्वप्न में भी न सोचा था मैंने,
रहना होगा बिन तेरे माँ।
छूट गया अब तेरा आँगन।
——अनिता शर्मा झाँसी
——मौलिक रचना
