सूखी रोटी में लपेट ली
साहब ने जो दी थी गाली
खाकर उसको, नयन-नीर से
उसने अपनी प्यास बुझा ली
‘अन्त्यज’ के ठेकेदारों से
पूछे , कोई जाकर के
आखिर क्या पाया उन्होंने
रोजी को ठुकरा कर के?
बदले में तुमने क्या पाया!
कुर्सी, शोहरत, बंगला, गाड़ी!!!
खड़ा रहा वो ठगा हुआ सा
तन से,मन से,धन से खाली
गाली खाकर नयन नीर से
उसने अपनी प्यास बुझा ली
शुभचिंतक, यदि थे तुम उसके
स्वाभिमान सिखलाया होता
पुरखों के कौशल का आदर
करना तो बतलाया होता
अब तो वो ना रहा कहीं का
पेट रहा खाली का खाली
खुद ही उसने अपनी दुनिया
अपने हाथों से लुटवा ली
गाली खाकर नयन नीर से
उसने अपनी प्यास बुझा ली
रोजी गई,रही ना रोटी
घर आंगन भी छूट गया
चमकीली आशा में, गांवों
से भी रिश्ता टूट गया
अब लौटा है ठोकर खाकर
थके पांव, छालों वाले
फिर से हुनर दिखायेगा वो
सौ सौ उसने कसमें खा लीं
आधी रोटी स्वाभिमान की
पीकर निज गौरव का पानी
नींद रात की, चैन दिवस का
वापस जैसे उसने पा ली
खाकर उसको नयन-नीर से…..
स्वरचित एवं मौलिक
व्यंजना दुबे
