कभी कभी घूरे के दिन भी फिर जाते हैं। अक्सर लोगों की बेरुखी झेलते रहे घूरे की भी कभी कभी पूजा हो जाती है। वास्तव में तो कुछ अवसरों पर घूरे को तलाशा जाता है। लोगों की सोच अक्सर आत्मकेंद्रित ही अधिक होती है। घूरे की उपासना के पीछे का रहस्य भी केवल खुद के सुखों की लालसा ही होती है। पूजा भी केवल मतलब हल करने का तरीका होता है। दूसरी तरफ लगातार उपेक्षा झेलता रहा वह घूरा खुद की पूजा देख आत्माहंकार की उस अवस्था में पहुंच जाता है, जहाँ तक न जाने की शिक्षा अधिकांश धर्म ग्रंथ देते हैं। शायद घूरा भी भूल जाता है कि जिस तरह आज उसका दिन फिरा है, पहले जैसी स्थिति भी जल्द आ सकती है। पर इस तरह अशुभ चिंतन करता ही कौन है। एक बार शुभ के बाद शुभ के ही स्वप्न देखे जाते हैं।
  किसी घूरे की उन्नति या पतन कभी भी किसी के विशेष चिंतन का विषय नहीं होता है। पर कई बार किसी मनुष्य की स्थिति भी ऐसी ही हो जाती है। जीवन भर अपमान, अवहेलना, तिरस्कार झेलते रहे मनुष्य की बुद्धि हमेशा उस कारण का पता करने में असमर्थ रहती है जिसके कारण अचानक उसका सम्मान होने लगा हो।
  जिस आदमी को कभी भी उसके वास्तविक नाम कालीचरण से नहीं बुलाया गया हो, कालू, और कालिया जिसके अघोषित नाम हो गये हों, जो अपने यथार्थ नाम को भी भूल चुका हो, अचानक वह श्री कालीचरण पुकारा जाने लगे तो फिर उसके पैर धरती पर न पड़ने के बहुत सारे आधार हैं। आसमान किसी एक का तो नहीं है। फिर किसी की उड़ान पर कटाक्ष करना कब उचित है।
   कालू की जीवन गाथा सुनायी जाये तो दुख को भी दुख होने लगेगा। बचपन में ही उसके माता-पिता गुजर गये। फिर उसकी देखरेख को कोई न था। सत्य यह था कि यदि वह बचपन में ही अनाथ न होता तो भी कौन उसकी देखभाल के लिये था। उसके पुरखे हमेशा ठाकुर साहब के परिवार की सेवा करते करते मरते रहे थे। वह फिर कौन सा अलग पहाड़ खोद लेता।
   ठाकुर परिवार जो कि वास्तव में बरतानिया सरकार के समय इलाके का जमीदार था, जिनका आदेश ही इस इलाके का कानून था, आजादी के बाद भी अपनी पुश्तैनी चमक में कम नहीं था। हालांकि अब परिवार बहुत बढ चुका था। परिवार के कुछ सदस्यों के मध्य पुश्तैनी जायदाद के कारण मुकदमे बाजी भी चल रही थी। जिसका नतीजा ही कब आता है। न्याय भी बहुधा शक्ति की आराधना करता है।
  जमींदार परिवार के कुछ सदस्य भले ही आज अप्रासंगिक हो गये हों तथा आज उन्हें जमींदार परिवार का कोई मानता भी न हो पर ठाकुर रोशन सिंह की शक्ति अभी भी किसी प्राचीन जमींदार से कम नहीं है। यथार्थ कहा जाये तो ठाकुर रोशन सिंह ने समय के अनुसार चलकर अपनी ताकत को गिरने नहीं दिया। वर्तमान तरीके से राजनीति में भाग लेकर उन्होंने अपनी शक्ति बहुत बढाई। पूरे इलाके पर उनका दबदबा आज भी नवीन रूप में कायम है। पिछले दो बार से सत्ताधारी दल ने उन्हें विधायक का टिकट दिया और वे दोनों बार विधायक भी बने। हालांकि सुना जाता है कि मंत्री पद की इच्छा से उनके हाईकमान से संबंध बिगड़ रहे हैं। फिर भी पार्टी उन्हें ही टिकट देगी, इसपर भरोसा किया जा सकता है।
  कालीचरण बचपन से ही हवेली में नौकर रहा। उस समय ठाकुर रौशन सिंह के पिता हवेली के ठाकुर थे। बचपन से ही बेहिसाब काम और काम के बदले रूखा सूखा खाना, बेहिसाब गालियां और कभी कभी मार भी उसके हिस्से में आती थी। समय आगे बढता गया। उसकी शादी के बाद उसकी औरत भी हवेली में काम करने लगी और कालीचरण बाहर खेतों का काम करने लगा। उनके बच्चों का बचपन भी हवेली में बेगारी में गुजरा। पर फिर उसकी स्थिति में बदलाव आने लगा। शायद यह समय का फेर था कि उसे उसके काम के बदले सही वेतन मिलने लगा। सरकारी योजना के तहत एक छोटा सा घर रहने को मिल गया। ठाकुर रोशन सिंह ने अपना बंगला शहर में बना लिया। गांव की हवेली की देखभाल कालीचरण के परिवार के हाथों में थी। जिसका पारिश्रमिक भले ही सरकारी मजदूरी दर से बहुत कम था, फिर भी कालीचरण के लिये बहुत ज्यादा था। फिर खुद के घर के साथ साथ हवेली का मनमाफिक उपयोग भी कालीचरण करने लगा। विरादरी में उसका मान बढा तो फिर थोड़ा अहंकार भी आ गया। हालांकि अभी तक कालीचरण को ज्ञात न था कि अभी उसके जीवन के दिन और भी बदलने बाले हैं।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
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