कतरा कतरा जो रगो में बहते थे,
जिन्हें हमने रहनुमाँ बन सँवारा था,
अपनी रहनुमाई से मुहँ चिढ़ाते हमे
आज वही हमारे रहनुमाँ बन बैठे हैं,
जिन कतरों को नाज़ों से संजोया था,
वही हमे छोड़ कहीं,आगे बह निकले है,
फ़िर सोचा कि,शामिल करदे किसी के
जीवन में, जो चंद कतरे बचे हैं रगो में,
शायद रोशन हो जाए किसी की दुनिया
और हमे भी कुछ मोल मिले इन कतरो का l
✍️ शालिनी गुप्ता प्रेमकमल🌸
(स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित)
#रक्त दान
