काश फिर से वो हसी हसरतें लौट आए,
फिर वो मासूम सा बचपन का इरादा आए,
काश के वो खुदा लिख दे, कुदरत के उन फरमानों को फिर से,
काश लौटे मेरे पापा भी खिलौने लेकर,
काश फिर से मेरे हाथों में वो खजाना आए,
काश जमाने की भी फितरत हो,
मेरी माँ जैसी जब मैं बिना बात के रूठूं तो मनना आए,
हम को कुदरत ही पढ़ा देती है कितने पाठ इस जमाने में,
काश उस्तादों को भी कुदरत सा पढ़ाना आए,
कभी स्कूलों से छुट्टी जो मिले, चीख कर बच्चों का वो शोर मचाना आए,
आज बचपन कहीं उलझा है किताबों में,
फिर वो तितली को पकड़ना और उड़ाना आए।
प्रिया धामा
भिलाई, छत्तीसगढ़
