निर्णय !!

रात्रि का अंतिम पहर’
दो घुड़सवार दृतगति से भवन की ओर चले आ रहे थे!

मदनिका दूर से ही समझ गयी थी की,वो दोनों कौन है”””
-वो रात्रि  के   अंतिम पहर तक वही बाहर राजपथ पर उन्ही का इंतजार  कर रही थी!
दोनों घुड़सवार भवन के बाहर आकर खडे हो गये!!!
ब्रह्ममुहुर्त की बेला सभी मंदिर के कपाट खुल गये थे,मीठी घंटियों की ध्वनि, शंख नाद का स्वर वातावरण मे गूंज रहा था” “
स्वागत है मान्यवर   “
आपकी प्रतिक्षा कुवांरी  पूरी रात करती रही “”
अभी शायद नींद लगी है”
ऐसा अचानक क्या  हो गया की””
राजनायक अधूरी बात छोडकर हर्षदेव के साथ कक्ष की ओर बढ गये””
कक्ष मे   हल्की रोशनी फैली थी!
मसनद का सहारा लेकर अमरा  सो रही थी”
राजनायक,  पुत्री अमरा  के निकट पहुंचे “””
पुत्री—सिर पर हाथ फेरते हुऐ  बोले,
पिता की आवाज सुनकर ,अमरा  ने धीरे से पलकें खोली “”
अधिक रोने से उसकी आंखें रक्तम्भ हो गयी थी!
पुत्री   अचानक  हुआ क्या “”
बाबा आपने अपनी अमरा  से इतना बडा सत्य क्यूँ छुपाया””
कैसा सत्य “”” सुनकर चौंके, राजनायक “”

मै  अनाथ बलिका हूं जिसकी आपने परिवारिश  की है”
मै आपकी संतान नही””भावुक होकर अश्रु बहाते हुऐ अमरा सुबक कर बोली”” उसके होंठ कांप रहे थे!
क्या फर्क पडता है  पुत्री, मेरी संतान हो या नही,मैने कभी सोचा भी नही बस तुम मेरी पुत्री हो यही मेरे लिए, सौभाग्य की बात है””
कैसा सौभाग्य, जो पुत्री  आपके राज्य छोडने का कारण बन गयी””
नही पुत्री ये सत्य नही है”मै स्वयंम् तुम्हें यहां से ले गया था”
फिर क्यूँ लाये””अंसतोष से बोली अमरा”
पुत्री तुम्हारी  महत्वकांक्षा दीर्घ हो रही थी,वो कुटिया छोटी  पड रही थी!
वहाँ  रहकर पूरा करना संभव नही था!
फिर अपने पास अर्थ भी नही था””न कोई सहयोगी “”
जो पिता अपनी पुत्री को छै दम्म की कंचुकी नही दिलवा सकता, उस पिता के हृदय से पूछो”
बोलते बोलते, पलकें भर आयी ,राजनायक की””
बाबा””गला भर गया अमरा का “”
वो लिपट गयी ,राजनायक के गले से””ये दृश्य बडा ही भावुक
करने वाला  था!!!
बहुत देर तक पिता और पुत्री के बीच कोई संवाद न हुआ “”

बाबा एक सत्य जानना है””
पूछो””
मेरी जन्मदात्री  कौन थी””‘
देवी साध्वी, बिना लाग लपेट के राजनायक बोले””
वो कौन थी””
, चम्पा राजा की पुत्री, जिसे जबरदस्ती, गणिका बनाया गया”
गणिका””‘क्या होती है बाबा”अमरा ने भोलेपन से पूछा””
पुत्री ,समय आने पर जान जाओगी!
मेरे पिता””””””
उसके बारे मे सही से मुझे ज्ञात नही”””पीछे अतीत मे झांकते हुए  बोले राजनायक “”
पर देवीसाध्वी ने अपनी इच्छा से राजनृतकी होना स्वीकार नही किया था”””
मतलब “” प्रश्नभरी नजरों से देखा अमरा ने””

सबकुछ बताने का समय आ गया है”””
बाबा आप चिन्तित है,
हा”””
आपकी चितां का कारण “””
तुम्हारा  अधिक सुंदर होना “‘”
मतलब””
देवी साध्वी ने भी सुदंर होने का मूल्य चुकाया है”‘
सुंदर होना क्या  अभिश्राप है”‘
नही जीवन कभी अभिश्राप नही होता ,कामी,पुरूष उसे अभिश्राप बना देते है”””
जिसमे वज्जी संघ को निर्मित करने वाले सबसे बडे भोगी होते है””उन्हे स्त्री सिर्फ भोग की वस्तु  ही नजर आती है”””

बाबा आपके कहने का मंतव्य  क्या है”

देवी साध्वी , जिनका नाम -चन्द्रबाला था!  जिनके सौदर्य की चर्चा दूर दूर तक थी,,वो एक राजकुमारी थी” “जो चम्पारण के राजा की पुत्री थी!””मनुदेव विलासता का पुजारी, उसकी नजर उसपर पडी तो उसे पाने को ललायित हो उठा””
उसी बीच युवराज ने वैराग्य अपना लिया जिससे पूरे राज्य मे अक्रोश  फैल गया, चारो ओर विनाश,युवा वर्ग, आगजनी और बलात् जोर जबरदस्ती पर उतारु हो गये”””
किसी भी भवन से किसी भी कन्या का अपहरण, और लूट मारकाट करना  छोटी बात हो गयी,
राजा वियोग मे  ,सबकुछ त्याग मरणसन्न स्थित मे पहुँच गये!
फिर आचार्य पणिनी ने एक नया रास्ता सुझाया, गिनती के लोग उस नियम से सहमत नही थे , उन्ही  लोगो में, मै “भी था’बाकी पूरा राज्य सहमत था! जो सहमत नही थे वो राज्य छोडकर ,छोटे गांवों मे जाकर जीवन यापन करने लगे””
इस नियम का फायदा उठाया  धूर्त और कामी लोगो ने”””। जिससे जन्म हुआ विलासता का, मद्यपान , वैश्यावृत्ति को खुलेआम स्वीकृति मिल गयी”””इससे विशालपुरी  के सारे नियम ध्वस्त हो गये”””जिसके चलते पुरूष  कर्म प्रधानता  से मुक्त हो,गये””युवा अपने उद्देश्य से भटक गये”स्त्रियों  की आर्थिक स्थिति डावांडोल हो गयी”तो उन्होने  -भी,, चाहे ,अनचाहे वैश्यवृति की राह अपनायी”””धीरे धीरे राज्य मे कुंठता ने जनम लिया अपराध बढने लगे””जिससे  नयी व्यव्स्था  का जन्म हुआ “उस व्यवस्था  के मद्देनजर, कुछ गण बनाऐ,गये””और वज्जिसंघ बना””””
उन्ही गणो के हाथों मे वज्जिसंघ को सौप दिया  गया”””जिसमे सभी जाति का एक प्रमुख चुना गया””
जैसे ही वज्जिसंघ का परचम लहराया, ,बाहरी राज्य के लोगो ने दस्तक दी”व्यापारियों के हौसले बुलंद हुऐ और विशालपुरी  वैभवपूर्ण  नगरों मे गिनी जाने लगी”””विलासता की हर वस्तु  यहां उपलब्ध थी”””
धीरे धीरे नगर में वज्जिसंघ कार्यकाल मे”जीवन सुचारू हो गया, व्यापार मजबूत हुआ “वैश्यावृत्ति  पर कर लगने लगा “”
फिर नयी योजना, बनी,धनाढ्य व्यापारियों के लिऐ नगर की सबसे सुंदर  युवती को चुना  गया “जिसे नाम दिया गया नगरवधू “”” उसे कुछ अधिकार भी दिये गये”””पर नाम मात्र “””
इतना बोलकर  लम्बी सांस ली राजनायक ने”””
बाबा ,,मां का क्या हुआ “””
सात वर्ष का समय एक मास भी न पूर्ण कर पायी”जिससे गर्भ धारण किया , उसी के रिश्तेदारों के कुचक्र मे फंसकर , तुम्हारे जन्म के बाद ,गंगा मैया मे शरण ले ली””””, जिसके बारे मे आज तक किसी को पता नही की देवी कहा अदृश्य, हो गयी”””मैने मेरे इन्ही हाथों से ,उन्हे  अग्नि शैया पर सुला कर हमेशा के लिए  मुक्त कर दिया “”
जब होश सम्भला तो तुम मेरी गोद मे थी””
गंगा मैया ने तुम्हे  ,मुझे उपहार के रुप में सौपा  था”””
तुम्हे देखते ही मेरे अंदर पिता वत्सल्य जाग उठा था!
मैने खुद को सौभाग्यशाली समझा “””
परन्तु  आज मुझसे दुर्भाग्यशाली राज्य मे कोई नही है””
बाबा ऐसे मत बोलो”आप ही मेरे बाबा हो””मै भले किसी के गर्भ से पैदा हुई””पर आप मेरे बाबा”हो””
पुत्री  बात अब वो नही है””
फिर””
कल नृत्य के कार्यक्रम मे उपस्थित होकर बडी भूल कर दी तुमने”””
पर गलती तुम्हारी नही थी पुत्री “””
मै ही तुम्हे नियति से लेकर भाग रहा था””पुष्प की खूश्बू को कैद नही किया जा सकता””आखिर मै जिस बात से डर रहा था वही हुआ “””ब्राह्मण मित्र  दिवाकर की भविष्य वाणी सत्य हुई”””
क्यूँ ,, क्या हुआ बाबा”””
भला हो युवराज कुणिक  का,और हा वो कुणिक ही तुम्हारा अनंगदेव है,और मगध का भावी सम्राट  भी ,ओर ये जो ,सामने खडा है”ये  मित्रपुत्र हर्षदेव है!

कुणिक जिसके ,बारे मे ,किसी को कुछ ज्ञात नही,अज्ञात है”
जो तुम्हारी परछाई भी है!
जो जाने कहां से आकर तुम्हे बचा लाया”””
हुआ क्या” बाबा”””
तुम इस राज्य तो क्या पूरे भारतवर्ष की सबसे सुंदर युवती हो””
बाबा ये तो सौभाग्य है!
नही पुत्री, ,यही दुर्भाग्य है,,,,हमारे पास तीन वर्ष का समय है,और इन्ही तीन वर्षो में  तुम्हे  बहुत कुछ सीखना है “

बाबा”””
अब सो जाओ कल से तुम्हारे जीवन मे बहुत सारी चुनौतियां आऐगी ,जिसकी तैयारी आज से करनी होगी”””
ये वो अग्नि होगी जिसमे तुम्हे तिल तिल जलकर स्वर्ण सा निखरना होगा”””
मै तैयार हूँ  बाबा आज से आप जो बोलेंगें वही मेरे लिए, मार्गदर्शन होगा “””
पूजा अर्चना का समय हो गया “” मै चलता हूं! !

क्रमशः
रीमा महेंद्र ठाकुर 

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