कालीचरण ने लड़के बालों के स्वागत सत्कार की पूरी व्यवस्था कर रखी थी। जानता था कि वह अपनी सामर्थ्य से बहूत ज्यादा कर रहा है। फिर अभी तो बस वे संबंध तय करने आ रहे हैं। आगे विवाह का भी पूरा खर्च है। पर सही बात थी कि इस समय उसपर भी कुछ माता लक्ष्मी का अहंकार छा रहा था। उसे लग रहा था कि जिस तरह उसकी आय हो रही है, उसी तरह आगे भी होती रहेगी। यदि वह अपनी सारी जमा पूंजी खर्च कर भी एक नातिन का विवाह इस परिवार में कर सका तब भी कोई घाटे का सौदा नहीं है। ठाकुर साहब की कृपा से साल दो साल में फिर से बहुत जमा हो जायेगा। दूसरी नातिन के लिये भी ठीक ठाक व्यवस्था बन जायेगी। बहुत अधिक संग्रह करना कालीचरण ने नहीं सीखा था।
  हवेली के जिस हिस्से पर कालीचरण की भैंसें बंधती थीं, वहां साफ सफाई करवा कर भट्टी चल रही थी। हवेली का बाहरी एक कमरा भी उसने खोल लिया था। पर इस कमरे और बरामदे में औरतों के बैठने की ही पूर पड़ना कठिन था। आदमियों के बैठने के लिये बाहर खुले में चांदनी तान व्यवस्था की थी। कालीचरण और उसके दोनों बेटों को सुबह से ही फुर्सत न थी। फुर्सत तो निम्मो और सुरैया को भी न थी। बीच बीच में समय निकाल दोनों अपनी बेटियों को कुछ न कुछ बताती जातीं। पता नहीं, कौन सी बात पर काम बन जाये और किस बात से मामला खटाई में पड़ जाये।
  आधे से ज्यादा दिन निकल गया। भगवान सूर्य कुछ पश्चिम की तरफ जाने लगे। हालांकि अभी भी बहुत गर्मी थी। गांव में गानों की आवाज आने लगीं। लड़के बाले आ गये। केवल कालीचरण और उनके बेटे ही नहीं बल्कि बिरादरी के दूसरे लोग भी अगवानी के लिये चले। संभवतः यह गांव बालों की निश्छलता थी। अथवा संभव यह भी था कि बड़े लोगों से मेलजोल बढाना सभी चाहते हों।
  स्वल्पाहार के साथ ठंडे शर्वत का दौर शुरू हुआ। पान, तमाकू, और बीड़ी की कोई कमी नहीं थी। रिश्तेदारों ने कितना उपयोग किया और कितना बाद के लिये अपनी जेबों में रखा, यह देखना महत्वहीन था। महत्वपूर्ण था कि किसी तरह इन्हें दोनों में से कोई लड़की पसंद आ जाये। 
  महिलाएं हवेली की बैठक में बैठ गयीं। कुछ को बरामदे में ही जगह मिल पायी। हर शुभ कार्य का आरंभ गाने बजाने से होना चाहिये। वैसे इनमें से कुछ महिलाओं के हाल ऐसे थे कि गाने बजाने के लिये भोजन भी भूल जातीं। हर बात में मनोरंजन तलाशना एक बड़ी कला है। इस कला को ग्रामीण परिवेश की महिलाएं अपने जीवन का अंग मानतीं थीं। शायद यही उनके जीवन की खुशियों का कारण था। अन्यथा यदि इन महिलाओं के जीवन के दुखों पर लिखने लगें तो पोथी ही भर जाये। 
  आखिर विंदु ने जमुना को इशारा किया। 
  ” समधिन जी। अब बेटियों को बुला दीजिये। हम भी उन्हें समझ लें। फिर शाम तक निकलना भी है।” 
जमुना ने निम्मो और सुरैया को इशारा किया। दोनों लड़कियों को बुलाने घर की तरफ चल दीं। घर पर केवल सौम्या और दया थीं। दोनों अपनी तरफ से पूरी तैयार थीं। फिर भी जैसे परीक्षा आरंभ होने से पूर्व जिस तरह विद्यार्थी मन में बैचेन होता है, कुछ वही वैचैनी दोनों के मुख पर झलक रही थी। जीवन की परीक्षा का पाठ्यक्रम अपार होता है। फिर कितनी भी तैयारी की जाये, कम ही रहती है। परीक्षक के पास परीक्षा लेने का एक विस्तृत दायरा होता है। विद्यार्थी की सफलता इस बात पर अधिक निर्भर करती है कि उसकी तैयारी के विषय और परीक्षक की रुचि के विषय कितने समान हैं। फिर यहाँ तो स्थिति और भी अलग विषम थी। परीक्षकों की एक पूरी बरात दो परीक्षार्थियों के भविष्य का फैसला करेंगीं। फिर संभावना यह भी है कि परीक्षक इस परीक्षा को खुद के स्वाभिमान से जोड़ लें। संभावना तो यह भी है कि परिवार के मुख्य सदस्यों के चयन पर रिश्तेदारों का चयन अधिक भारी पड़ जाये। आखिर जिन्हें लेकर आये हैं, उनकी बात भी तो माननी होगी। 
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
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