कहीं शुद्धता नहीं रह गई,मिलावटखोरी का जमाना है।
ईमानदारी ये नहीं रह गई, मुनाफाखोरी का जमाना है।
कालीमिर्च में मिल रहा है,निकल रहा पपीते का बीज।
धनिया सूखी पीस रहा है, धनिया डंठल डाल के बीज।
सूखा लाल मिर्चा पिसा है,पिसा संग में मिर्चा की घुंडी।
कैसे-कैसे कमाई करते हैं,झोंक धूल आँख में बढ़े हुंडी।
हल्दीपाउडर हो या कोई,अन्य पिसे हुए ये गर्म मसाले।
काला नमक सेंधा नमक,आयोडीननमक चाट मसाले।
चावल में प्लास्टिक के हैं,मिले हुए यह नकली चावल।
इन्हें पकाए खाए तो मिले,हमें ब्रेकेट शेप में ये चावल।
अरहर के दाल में चपरी है,जिसे मिलाकर ये बेचें दाल।
हर अनाज में कंकड़ मिलते,गेहूं चना मटर हो या दाल।
कुछ नकली दूध बनाके बेंचें,कुछ दूध में डालरहे पानी।
नकली सरसो तेल बनाके बेंचें,कहें तेल है कच्ची घानी।
नकली खोया पनीर बिक रहा,नकली बिक रही मिठाई।
त्यौहारों पर्वों मेलों में बिकता,खूब धड़ल्ले से ये मिठाई।
सुई लगी लौकी बिकती है,रंग चढ़ा भिंडी बैगन परवल।
केमिकल डालें रगड़ें आलू,नई आलू बता बेचें अपरबल।
नकली बंद/पत्ता गोभी बेचें,अदरख,टमाटर हरी धनिया।
तरह-2 के मिलावटी समान,बेंचरहे मुनाफाखोर बनिया।
नकली सिरप टेबलेट कैप्सूल,मरहम ग्लूकोज इंजेक्शन।
जीवनरक्षक दवाएं बिकती हैं,ताकत के बिकें इंजेक्शन।
खा-खा के लोग बीमार हो रहे,दौड़े डॉक्टर से लें दवाई।
कभी-2 ये ठीक हो जाते हैं,कभी-2 जान पर बन आई।
इंसानियत कहाँ चली गई,रह न गई यह अब इंसानों में।
मानवता ये बेंच दिया है,मुनाफा मिलावट के इंसानों ने।
आपदा को भी अवसर समझें,ये लालची और बेईमान।
रुपये कैसेभी आये पाकेट में,भले जान से खेलें इंसान।
भोग रहा है गलत कमा के,फिरभी आँख नहीं खुलती।
अपने-अपनों के जान पर,आए तो आँख भले खुलती।
रचयिता :
डॉ. विनय कुमार श्रीवास्तव
वरिष्ठ प्रवक्ता-पी बी कालेज,प्रतापगढ़ सिटी,उ.प्र.
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