घटाएं काली, घिरे हैं बदरा ,
दिन में रात भई अंधियारी ,
घबरा घबरा जाए जिया।
अपना शहर छोड़कर,
परदेश चले ऐसे मौसम में सजना,
पीछे मुड़ मुड़के देखें छुटी जो डगरिया।
झूठी मुस्कान गोरी अधरों पे सजाए,
नयना भरे अंसुवन गोरी खड़ी झुकाए,
डरे देख न ले कहीं जाते पिया।
कितना कठिन छोड़ना अपना शहर,
परदेश में  जाके ढूढना घर,
सब कुछ मिले परदेश में पर फिर भी भर आए जिया।
  आना पड़ा सब कुछ छोड़कर,
सगे सम्बन्धियों से बिछड़कर,
घर बनाने के लिए छोड़ी घर की देहरिया।
मुसाफिर जैसा मिलना बिछड़ना,
रह गए जीवन का यही खेला,
इसी में बीत जाएगी उमरिया।
अन्जू दीक्षित,
उत्तर प्रदेश।
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