कविता -विश्वास और भरोसा
पहाड़ों के बीच टेढ़ी मेढ़ी रस्ते पर
बस चल रही थी
जीवन की रेखा सी रस्ते पर ऊपर
नीचे चढ़ रही थी
सीधे रस्ते पर चलना तो राहत भरी
भरी सी लगती है
किन्तु उतार चढ़ाव भरी जिंदगी खुद को
जीवन कहती है!
देवी दर्शन को सीढ़ी सी रस्ते पर सभी यात्री
चढ़ रहे थें
मगर कुछ को लगता कि बस अब वे नीचे
उतर रहे थें
चढ़ते जितने ऊपर, नीचे उतनी ही गहरी
खाईं थी
झांकता जो बस से बाहर लगता कि अब
मौत आयी थी
कोई दुपका कोई लटका कोई देता
दुहाई था
बस में चारो ओर पसरा सन्नाटा मचा
हाय हाई था
एक नन्ही परी सी चालक की बच्ची
डर भय से दूर थी
ना कोई चिंता ना डर ना भय ना शोक
ना ही मजबूर थी
उसे विश्वास था भरोसा था अपने
पिता पर
कौन पिता गिरने देगा अपने औलाद को
चिता पर,
पिता ही विश्वास अटल, दुनिया में सबसे
सबका मालिक एक, पिता है दुनिया जबसे
है जैसे विश्वास, गगन चंदा तारों पे
बना रहे विश्वास सदा अपने प्यारों से
रचनाकार -रामवृक्ष बहादुरपुरी’,अम्बेडकरनगर।
