स्वामी विवेकानंद

कविता

दोहा

ऊपर हम सबने लखे , नित्य भास्कर चंद।

भूपर आये नरेंद्र फिर, बनें विवेकानंद।

युवा दिवस हम आज मनायें।

हम स्वामी जी के गुण गायें ।

ऊपर से जब भूपर आये।

कुछ कहते नर बन शिव आयेजन्मे जब नरेंद्र मनभावन।

बारह जनवरी का दिन पावन।

भुवनेश्वरी थी, इनकी मैया।

विश्वनाथ दत्त के छैया।

कलकत्ता की पावन धरती।

भय, दुःख दूर कालिका करतीं।

शिक्षा प्राप्त कीन बहुतेरी।

तर्कशील याददाश्त घनेरी।

राम कृष्ण के पास सिधाये।

सभी प्रश्नों के उत्तर पाये।

उनको अपना गुरु बनाये।

दीन हीन की सेवा कीनी।

ऊंच नीच की परवाह न कीनी।

देश विदेश घूमें जाई।

भारत की पहचान बनाई।

हिंदू धर्म का मान बढ़ाया।

देश विदेशी में फैलाया।

हिंदू धर्म प्रणेता स्वामी।

राम कृष्ण के थे, अनुगामी।

धर्म संसद में हिस्सा लीना।

सबसे अंत में मौका दीना।

मौका पाकर चौका दीना।

स्वामी जी संबोधन कीना।

बहिन भाईयों को कहके बुलाये।

सुनकर सबके हिय हरषाये।

धर्म ज्ञान विज्ञान बताये।

शून्य में सारा जगत समाये।

वाह वाह कर सब चिल्लाये।

स्वामी जी की शरण में आये।

भारत देश का मान बढ़ाये।

स्वामी विवेकानंद कहाये।

चार वरस अमेरिका घूमें।

मान सम्मान पाय मन झूमें।

भग्नि निवेदिता शिष्य बनाई।

जिसने की भारत की भलाई।

तभी लौट कर भारत आए।

देश भ्रमण कर समय विताये।

सदियों में कोई बिरला आये।

अपना नाम अमर कर जाये।

उनको शत् शत् नमन हमारा।

देश भक्ति को धर्म बिचारा।

केबल राम भजन सुखदाई।

शिष्यों को ये सीख सिखाई।

उन्नीस सौ दो में तन त्यागा।

भारत को कर दिया अभागा।

बलराम यादव देवरा छतरपुर

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