शीर्षक – “विवाह”

युगों-युगों से चला आ रहा विवाह-संस्कार,
महिमा मण्डित सामाजिक जीवन का चोला है।
हर धर्म, समुदाय व क्षेत्र विश्व पटल पर निभाता है।
भले ही तौर-तरीके अलग-अलग, मन्तव्य सबका एक है।
शारीरिक मिलन का ये जनादेश है।
पारिवारिक उत्तरदायित्वों को निभाने का संकल्प है।
समाज को आगे बढ़ाते रहने का सुघढ़ संकल्प है।
जीवन-पथ का अद्वितीय स्नेहिल मोड़ है।
संयम,सेवा त्याग, तपस्या के अभ्यास का आलय दे,
जीवन में सामंजस्य का पाठ पढ़ाता है।
उच्श्रृंखलता से विमुख मधुर बंधन की डगर है।
विवाह नहीं केवल दो जनों का मेल है।
विवाह दो कुलों/ परिवारों का सुवासित मेल है।
ऐसा ही अद्भुत सामाजिकता का विस्तार है।
कुल को वारिस दे आगे बढ़ते जाने का खेल है।

रचयिता – सुषमा श्रीवास्तव, मौलिक कृति,सर्वाधिकार सुरक्षित, रुद्रपुर, उत्तराखंड।

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