दर्पण बता वो बचपन कहाँ है
प्यारा दुलारा वो बचपन कहाँ है
बचपन तो अब दब गया बोझ से
बस्ता पढ़ाई का भारी हो गया है
न खाने का मन नखेलने की इच्छा
सोते जागते बस पढ़ाई की चर्चा
माता पिता की आकांछा के तले
बचपन बेचारा दब सा गया है
उछल कूद खेल पढ़ाई सब
मोबाइल मे ही कैद हो गए
बता दो जरा दर्पण वह
बचपन कहाँ खो गया।।
मस्ती भरा वो बेफिक्र बचपन
न कोई चिंता ना था कोई गम
बेफिक्र सोना और खेलना
था न सिवा इसके दूजा काम
वो प्यारा सा बचपन
दुलारा सा बचपन
बता तो दर्पण
कहाँ खो गया है।।
