विगलित होता मन एकान्त माँगता है ।
एकान्त में जा हल ढूंढता है, आसान नहीं है इतना हल का मिल जाना।
गली गली, बहु गलियारों में है खोजता-फिरता ,
फिर लौट कर आता अपने ही अंदर,
  शांत होता जब व्यथित मन ,
तब कहीं जाकर मिलता सकूं का अनमोल पल ।
क्या समझे?
तलाशो अन्तर्मन में ही है खोई हुई शान्ति,
मत लगा व्यर्थ की दौड़ इस भ्रमजाल में,
जिसका अंश है तू अन्ततः उसी में समाना है।
यही है सच्चाई तू इससे मुँह मत मोड़।
जिस हेतु आया हुआ है,उसे न भुलाना,
कर्म-पथ पर निस्पृह-निर्लिप्त
अनवरत बढ़ते ही जाना,बढ़ते ही जाना।                     निश्चय ही
इक स्वर्णिम दिन आएगा, अन्तिम सोपान मिल जाएगा।
धन्यवाद!
रचयिता– सुषमा श्रीवास्तव,मौलिक कृति,सर्वाधिकार सुरक्षित, रुद्रपुर, उत्तराखंड।
12/11/22

Spread the love

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *