इश्क़ का पैगाम देने को तो आँखें की काफ़ी हैं,
अधरों को हिलाने की कोई ज़रूरत नहीं।
दिल से दिल को राह मिलती है।
तन से तन का मिलन कोई ज़रूरी नहीं।
भावनाओं को आकार देने का वक्त मुकम्मल नहीं,
इश्क़ का इज़हार करने की ज़रूरत नहीं।
मन-मस्तिष्क रम गया है तुझमें इस कदर,
किसी दूजे के लिए तो जगह बची ही नहीं।
तेरे दर पर खड़ें होते हैं हर पैगाम लिए,
दूजे द्वार को देखना भी कभी सोचा ही नहीं।
करती अरदास सुषमा हरदम,
हो भला सबका, उसमें ही मेरा सही।

रचयिता – सुषमा श्रीवास्तव, मौलिक कृति, सर्वाधिकार सुरक्षित, रुद्रपुर, उत्तराखंड।

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