शरद आया संग ले आया, त्यौहारों की बारात,
वर्षा के कीट- पतंगे,छुपते सारी सारी रात।
ऋतु मनभावन हुई, नहीं शीत न ताप,
आश्विन गया,कार्तिक में करवा करवारी गया ,दी दिवाली ने दस्तक।
आज से आरंभ हो गयी,
भारतीय संस्कृति के ज्ञान, चिकित्सा,स्वास्थ्य औ वैभव
ऐश्वर्य, प्रेम – मिलाप व रिश्तों में बंधा हुआ अद्भुत छटा बिखेरता दीपावली का पर्व-
धनतेरस पर सजी दुकानें आकर्षित करतीं,
आकर्षित करतीं संग जेब पर भारी पडतीं।
नरक चतुर्दशी को यम के दीप प्रज्वलित हो उठते,
महावीर को भोग के देखो लड्डू दोना भर चढ़ते।
दीपावली की सजावट से खिल उठते छत आँगन बाजार,
लक्ष्मी-गणेश का पूजन होता, बंद हो जाती कलम दवात,
अन्नकूट, गोवर्धन पूजें, घर-घर भेजें सौगात।
चित्रगुप्त का पूजन कर खुल जाती कलम दवात।
बहन भाई का टीका करती लेती खूब बलैया,
पकवानों की खूशबू ऐसी,पेट कहे दैया दैया।
रचनाकार- सुषमा श्रीवास्तव, मौलिक कृति,सर्वाधिकार सुरक्षित, रुद्रपुर, उत्तराखंड।

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