नकारात्मकता से सकारात्मकता की ओर चलें- के संदर्भ में मैं यही कहूँगी कि सच मानिए ऐसा करने पर असंभव दिखने वाला भी संभव ही हो जाएगा।असंभव का अस्तित्व ही नहीं बचेगा।
सकारात्मकता की शुरुआत आशा और विश्वास से होती है। मान लीजिए किसी जगह पर चारों ओर अँधेरा है और कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा और वहाँ पर अगर हम एक छोटा सा दीपक जला देंगे तो उस दीपक में इतनी शक्ति है कि वह छोटा सा दीपक चारों ओर फैले अन्धकार को एक ही पल में दूर कर देगा।
नकारात्मक सोच के अँधेरे से बाहर निकलने के लिए हमें अपने मस्तिष्क को प्रशिक्षित करना होता है। थोड़े से प्रयास से दृष्टिकोण को बदलकर हम सकारात्मकता की ज्योति पुंज की ओर बढ़ चलते हैं।
आप वास्तव में जो चाहते हैं, आपका मस्तिष्क स्वत: ही आपको उस दिशा की ओर
आकर्षित कर लेता है। इसलिए नकारात्मकता के अँधेरे से सकारात्मकता की रोशनी में बड़ी ही सहजता से आ सकते हैं। बस, आपको अपने मस्तिष्क में बने हुए अपने दृष्टिकोण और उसकी शब्दावली में थोड़ा सा बदलाव लाना होगा।
सर्वप्रथम स्वयं से वादा करें कि आप ‘इस क्षण’ के लिए समर्पित रहेंगे। इसका मतलब यह है कि आज, अभी जो क्षण है, वही आपका है और आपको उसका पूरा उपभोग करना ही है। अगला जो क्षण आएगा, वह भी ‘इस क्षण’में ही परिवर्तित हो जाएगा। इस सोच से आपका विचार, दिमाग और जीवन सब परिष्कृत हो जाएगा।
आप यदि सपने देख सकते हैं, तो उसे पूरा भी कर सकते हैं। फिर आप अपनी कल्पना के घोड़े को प्रचंड तरीके से आगे ही आगे बढ़ने दें और खुद को आदर्श तथा सुयोग्य समझते हुए सकारात्मक विचारों का ही अनुभव करेंगे।
इस तरह प्रदर्शित करें कि आप वर्तमान में हैं, आप खुश हैं, वैसा ही अभिनय करें, जैसा कि आप होने की इच्छा रखते हैं। एक समय ऐसा आएगा, जब आपका मस्तिष्क इतना बदल जाएगा कि आप वास्तव में वैसे ही हो जाएंगे। यदि दिल और दिमाग से खूबसूरत खुशहाली का ख्याल रखेंगे तो आप अपने लिए और दूसरों के लिए भी खुशहाली का सृजन कर ही लेंगे।
इसी संदर्भ में मैं आपके समक्ष गीता के संदेश का भाव रखना चाहती हूँ -: श्रद्धा रखने वाले अपनी इंद्रियों पर संयम कर ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं। वहीं ज्ञान मिल जाने पर, जल्द ही परम शांति को प्राप्त होते हैं। श्रीकृष्ण के अनुसार- ज्ञान से ही परम शांति मिलती है। लेकिन ज्ञान का आना सहज नहीं होता। ज्ञान के लिए आपको एकमात्र श्रद्धा अर्थात् विश्वास का सहारा लेना होगा। श्रद्धा का एक अर्थ किसी को जानने की उत्कट इच्छा है। बिना जानने की इच्छा के हम किसी को भी जान नहीं सकते। जान लेने के बाद ही हम उसे मान पाते हैं और हमारी श्रद्धा पूर्णता पा लेती है। जिसके अंदर जानने और मानने की अगाध इच्छा होती है, वही श्रद्धालु है और वही ज्ञानी भी। जब हम जान और मान लेते हैं अर्थात ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं, तब हमारे भीतर की हलचल समाप्त हो जाती है। हमारी इंद्रिया हमारे भीतर व्यवस्थित और स्थिर हो जाती हैं। हमारी जुगुप्सा मिट जाती है और हमें परम शांति का अनुभव होता है।
ठीक यही भाव नकारात्मकता से सकारात्मकता की ओर चलते समय होना श्रेयस्कर होता है।
धन्यवाद!
राम राम जय श्रीराम!
लेखिका- सुषमा श्रीवास्तव, मौलिक विचार, रुद्रपुर, उत्तराखंड।


