🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳

अपने जीवन को कुर्बान कर देने वाले, पल-प्रति-पल मौत के साये में बैठे रहने वाले, अपने घर-परिवार से दूर नितांत निर्जन में कर्तव्य निर्वहन करने वाले जाँबाज़ सैनिकों के लिए बस चंद शब्द, चंद वाक्य, चंद फूल, दो-चार मालाएँ, दो-चार दीप और फिर उनकी शहादत को विस्मृत कर देना,
 उन सैनिकों को विस्मृत कर देना बस इतना सा ही तो दायित्व
निभाते हैं हम. ये अपने आप में कितना आश्चर्यजनक है साथ ही विद्रूपता से भरा हुआ कि जिन सैनिकों के चलते हम स्वतंत्रता का आनंद उठा रहे हैं उन्हीं सैनिकों को हमारा समाज न तो जीते-जी यथोचित सम्मान देता है और न ही उनकी शहादत के बाद. समूचे परिदृश्य को राजनैतिक चश्मे से देखने की आदत के चलते, वातावरण में तुष्टिकरण का रंग भरने की कुप्रवृत्ति के चलते, प्रत्येक कार्य के पीछे स्वार्थ होने की मानसिकता के चलते समाज में सैनिकों के प्रति भी सम्मान का भाव धीरे-धीरे तिरोहित होता जा रहा है. न केवल सरकारें वरन आम नागरिक भी सैनिकों को देश पर जान न्यौछावर करने वाले के रूप में नहीं वरन सेना में नौकरी करने वाले व्यक्ति के रूप में देखने लगे हैं; उनके कार्य को देश-प्रेम से नहीं बल्कि जीवन-यापन से जोड़ने लगे हैं; उनकी शहादत को शहादत नहीं वरन नौकरी करने का अंजाम बताने लगे हैं.
ऐसा इसलिए सच दिखता है क्योंकि अब सैनिकों के काफिले शहर से ख़ामोशी से गुजर जाते हैं. उनके निकलने पर न कोई बालक, न कोई युवा, न कोई बुजुर्ग जयहिन्द की मुद्रा में दिखता है, न ही भारत माता की जय का घोष सुनाई देता है. समाज की ऐसी बेरुखी के चलते ही सरकारें भी सैनिकों के प्रति अपने कर्तव्य-दायित्व से विमुख होती दिखने लगी हैं. यदि ऐसा न होता तो किसी शहीद सैनिक के नाम पर कोई नेता अपशब्द बोलने की हिम्मत न करता; किसी सैनिक की शहादत को तुष्टिकरण से न जोड़ा जाता; किसी सैन्य कार्यवाही को फर्जी न बताया जाता.
संभव है कि एक सैनिक  के लिए अपनी जीवका के लिए सेना में जाना मजबूरी रहती हो किन्तु किसी सैनिक की शहादत के बाद भी उसकी संतानों के द्वरा उस पर गर्व करना, सैनिक बनकर देस की राक्षा करने का का संकल्प लेना, उस अमर सहीद के परिजनों द्वरा तिरंगे पर बलिदान होते रहना की कसम उठाना तो मजबूरी नही होसकती बहरहाल ,देर तो अभी भी नही हुई है हम सभी को एक साथ जागना होगा निरंतन जागे रहना होगा ना सही प्रती दिन तो  माह में किसी एक दिन समस्त सैनिको की वीरता के बारे में तो बता ही सकते है न सही किसी राजनीति का समर्थन किन्तु सैनिको के अपमान में बोले जाने वाला बचनों का पुरजोर विरोध तो कर ही सकता है
समाज किसी भी दिशा में जाएं, राजनीति अपनी करवट किसी भी तरफ ले तुष्टिकरण  की नीति क्या हो यह अलग बात है मगर सच यह है कि ये सैनिक है, इस लिए हम है सच यह है कि सैनिको की उंगली ट्रीगर पर होती है, तभी हम हवा में सांस ले रहे है सच यह है कि वह हजारो फिट ऊपर ठण्ड में अपनी हड्डियां गलता है ताभी हम बुद्धिजीव होने का दंभ पला पाते है,सच है कि वह सैनिक अपनी जान को दाव पर लगाये बैठे होता है,तभी हम हम पूरी तरह जीवन का आनंद उठा पाते है, सच यह है कि एक सैनिक अपने परिवार से दूर तन्मयता से आपना कर्तब्य निभाता है ताभी हम आपने  परिवार के साथ खुशिया बाट पाते है,,,,,
देखा जाये तो अंतिम सच यही है,कठोर सच यही है,आंसू लाने वाला सच यही है,तिरंगे पर मर मिटने वाला सच यही है,परिवार में एक सहादत के बाद भी उनकी संतानों सैनिक बनाने वाला सच यही है, कम से कम हम नागरिक तो इस सच को विस्मृत न होने दे,,काम से कम कम हम नागरिक सैनिको के सम्मन को कम न होने दे,, कम से कम हम नागरिक तो उनकी शहादत पर राजनीति न होने दे,,काम से कम हम नागरिक तो उन सैनिको को इतना तो बोल सकते है,,,,,,,,
जय हिंद,,,जय हिंद,,,जय हिंद,
,,,,स्वरचित🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳
✍️✍️✍️✍️प्रितम वर्मा🎄
Spread the love

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *