अक्सर गहरे जख्म भरते नहीं हैं। ऊपर से सब ठीक होने पर भी वे जख्म अपने निशान छोड़ जाते हैं। कभी न कभी तो पुरानी चोट दर्द करती ही हैं। ऊपर से यदि कोई उसी जख्म के स्थान को छेड़ने लगे तब बहुधा पुराने जख्म फिर से हरे हो जाते हैं।
   सोहन के जीवन में भी एक गहरा जख्म सरस्वती ने दिया था। उसी के कारण वह कुछ समय मानसिक रूप से अस्वस्थ भी रहा था। बाद में भी उस जख्म की पीड़ा से उबर नहीं पाया था। संत का वेष रख उस जख्म का इलाज रखने का प्रयास करता रहा। पर सत्य तो यही है कि उसके अंतर्मन में वह जख्म आज भी उतना ही गहरा था। तभी तो जब सौदामिनी ने उसे सरस्वती से विवाह कर लेने की सलाह दी तो सोहन विचलित हो उठा। एक गिरी हुई स्त्री को सहारा देकर वह खुद गिरने की कल्पना करने लगा। पर सत्य तो यही है कि समय के साथ बहुत बदल जाता है। कभी कभी जो बहुत निम्न होता है, वह भी उच्चता की अवस्था तक पहुंच जाता है।
   सोहन के मन में सरस्वती के लिये ज्यादातर द्वेष के ही भाव आये। धोखेबाज हमेशा ही धोखा देते हैं। निश्चित ही आज सरस्वती विपदा में हैं। फिर वह मेरा प्रेम आमंत्रण स्वीकार भी कर लेगी। पर कब तक। जिस समय उसे मुझसे भी बेहतर कुछ अन्य दिखाई देगा, वह मुझे फिर से वैसी ही पीड़ा दे जायेगी। जिस घाव को बड़ी कठिनाई से ठीक किया है, उसी स्थान पर दूसरी चोट अधिक पीड़ादायक रहेगी। शायद दूसरी चोट इतनी कठिन हो कि सोहन उस चोट से कभी उवर ही न पाये।
   जब कोई मनुष्य छोटा सोचने लगता है, उस समय उसे किसी की बड़ी सोच भी छोटी ही लगती है। सौदामिनी के भाव भी उसे बनावटी लग रहे थे। जैसे कभी मन न होने पर उसने सौदामिनी से संबंध के लिये इंकार करने के लिये माता और पुत्र की भूमिका बनायी थी। लगता है कि आज उसी घटना की पुनरावृत्ति हुई है। आज सौदामिनी वास्तव में सक्षम है। इतने समय में ठीक ठाक पढाई भी कर ली है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर नर्स के रूप में कार्यरत है। कुछ महीने पूर्व ही इन्हें पुरस्कार भी मिला है। उपलब्धियां निश्चित ही किसी के मन में अहंकार को जन्म देती हैं। संभावना यही है कि जिस तरह मेरे इंकार का कारण मेरे मन में एक दूसरी स्त्री से प्रेम का होना था, आज सौदामिनी के इंकार का भी ऐसा ही कोई कारण हो। आखिर बाहर पुरुषों के साथ काम करती हैं। इतने समय में कोई इनके मन में बस चुका हो।
  संभावना यह भी है कि ऐसा कुछ न हो। पर निश्चित ही आज यह मुझे खुद के समकक्ष नहीं समझ रही हैं। हर स्त्री अपने समकक्ष ही जीवन साथी की चाह रखती है। 
   ठीक है कि यदि इस संबंध से इंकार था तो स्पष्ट बोल देतीं। निश्चित ही मेरा यह सोचना मेरी भूल ही थी कि मैं सौदामिनी के जीवन का सहारा बन सकता हूं। निश्चित ही मुझसे निर्णय करने में भूल हुई है। निश्चित ही एक बार फिर से मैं सत्य समझ नहीं पाया। 
   इंकार तक ठीक था। माता और पुत्र का संबंध का ढोंग कर लेना भी ठीक था। पर मेरे पुराने जख्मों को कुरेदने लगना, नहीं यह तो उचित नहीं है। जख्म कितने भी पुराने हो जायें पर पीड़ा तो देते ही हैं। 
   आखिर पुराने जख्म हरे हो ही चुके थे। अनेकों पुरानी बातें ध्यान आने लगी। सरस्वती के धोखे को याद कर अनेकों बार सोहन के मन में उसके लिये बद्दुआएं निकलीं। अनेकों बार उसने सरस्वती की वर्तमान दशा पर मन में खुशियां मनायी। 
   फिर भी न चाहते हुए भी उसे कुछ बेहद हसीन पल याद आने लगे। वे पल जबकि वह प्रेम की डोर में बंधा सरस्वती रूपी पुष्प का भंवर बना हुआ था। सरस्वती की पीड़ा देखकर ही वह रोने लगता था। सरस्वती के मुख की मुस्कान उसके चेहरे पर भी मुस्कान ला देती थी। सरस्वती को चिंता में देख वह खुद चिंता के सागर में डुबकियाँ लेने लगता था। 
   आज सोहन फिर से उसी तरह दुखी होने लगा। सरस्वती के दुख को अपना दुख समझ मन ही मन रोने लगा। सरस्वती की विपत्ति में उसे सहारा देने की कामना मन में उठने लगी। अब सोहन वही पुराना प्रेमी था जो कि सरस्वती पर अपने प्राण भी अर्पण कर सकता था।
  सच्चाई तो यही है कि मन में उत्तम भाव भले ही दुर्विचारों की फौज देख मन की किसी गुप्त कंदरा में छिप जाते हैं। पर वे कभी मरते नहीं हैं। उपयुक्त समय की प्रतीक्षा करते हैं। दिन, सप्ताह, महीने और वर्षों तक छिपे इन सुविचारों को अनेकों बार वह व्यक्ति भी मृतक मान लेता है। फिर जब वर्षों बाद वह उन्हीं भावों को अपने मन में वापस देखता है, उस समय वह खुशी के कारण ही रोने लगता है। कोई प्रिय जिसे लापता की स्थिति में मृतक ही मान लिया गया था, अपने जीवन होने का प्रमाण देने लगता है, उस प्रसन्नता को शव्दों से व्यक्त कर पाना असंभव ही है।
   सोहन ने सौदामिनी के विचारों को अभी तक पाखंड ही समझा था। फिर भी वह मन ही मन सौदामिनी को धन्यवाद दे रहा था कि उसने उसे जीवन की नयी राह बतायी। हालांकि सोहन अभी भी अहंकार और आत्मविश्वास के उस भंवर में फसा था जबकि उसे लग ही नहीं रहा था कि उसके निवेदन को सरस्वती अस्वीकार भी कर सकती है।
  सोहन के मन में बने भविष्य के चलचित्र में सोहन देख रहा था कि उसे देखकर सरस्वती संकोच और अपराधबोध की दशा से गुजर रही है। फिर वही सरस्वती को सम्हालता है। उसे विश्वास देता है कि वह आज भी सरस्वती से उसी तरह प्रेम करता है। प्रेम में आज भी वह सरस्वती को अपनी जीवन संगिनी बनाना चाहता है। पुरानी बालों को भुला वह आज भी उसका हाथ पकड़कर जीवन समर में चलने को तैयार है। फिर आंखों में आंसू भरकर सरस्वती उसके पैरों में गिर जाती है। जो कि सरस्वती के समर्पण और प्रेम की जीत का प्रतीक है।
   अहंकार के मद में चूर सोहन यह समझ ही नहीं सकता था कि जब वास्तविक चलचित्र आरंभ होगा तब वह उसके मन के आभासी चलचित्र से कुछ अलग भी हो सकता है।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
Spread the love

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *