हो तिमिर घनघोर या,शूलों भरा पथ हो कही
बढ़ते रहना तुम न रुकना ,पांव डगमग हो कभी
इस तरह ही तुम सदा आगे को बढ़ते जाओगे
सत्य कहती हूँ यूंही एक दिन सफलता पाओगे
देखना न तुम सहारा,आगे ही होगा किनारा
पीछे न देखोगे तो ,सैलाब से बच जाओगे
सत्य कहती,,,,,,,,
जो भी बोले ये जमाना ,मौन हो तुम सुनते जाना
जो कहीं देने लगे उत्तर,उलझते जाओगे
सत्य कहती,,,,,,,,
पथ भ्रमित करने को, बैठे है कई बाजार में
तय स्वयं करना तुम्ही ,करना है क्या संसार में
सत्य का पकड़े यूं दामन, तुम तो लड़ते जाओगे
सत्य कहती हूँ यूं ही एक दिन सफलता पाओगे।
इंदु विवेक उदैनियाँ
स्वरचित
