आधार : मतलब निकल गया तो पहचानते नहीं
अब हम मना रहे हैं तो मानते नहीं।
ऐसे वो जा रहे हैं जैसे जानते नहीं।।
अपनी गरज थी जब तो बुलाना कबूल था।
बाहों में अपने रात भर झुलाना कबूल था।।
अब हम मना रहे है तो मानते नहीं।
ऐसे वो जा रहे हैं जैसे जानते नहीं।।
मतलब निकल गया तो पहचानते नहीं….2
मेरे अलावा कोई नहीं ये उनका उसूल था।
लगता है जैसे करना मुहब्बत फिजूल था।।
अब हम मना रहे है तो मानते नहीं।
ऐसे वो जा रहे हैं जैसे जानते नहीं।।
मतलब निकल गया तो पहचानते नहीं….2
जबतक अधखिली रही तब तक कबूल था।
खिलते ही क्यों? लगा उन्हें उनका भूल था।।
अब हम मना रहे हैं तो मानते नहीं।
ऐसे वो जा रहे हैं जैसे जानते नहीं।।
मतलब निकल गया तो पहचानते नहीं….2
बाबुल से मुंह को मोड़ा ये हमको कुबूल था।
जिनके लिए लड़ी मरी जिन्हें सब कुबूल था।।
अब हम मना रहे हैं तो मानते नहीं।
ऐसे वो जा रहे हैं जैसे जानते नहीं।।
मतलब निकल गया तो पहचानते नहीं….2
करते हैं इश्क क्यों जो ये बेवफाई उसूल था।
रंगरेलियां मनाना शायद ये उनका उसूल था।।
अब हम मना रहे हैं तो मानते नहीं।
ऐसे वो जा रहे हैं जैसे जानते नहीं।।
मतलब निकल गया तो पहचानते नहीं….2
रचयिता :
डॉ. विनय कुमार श्रीवास्तव
वरिष्ठ प्रवक्ता-पीबी कालेज,प्रतापगढ़ सिटी,उ.प्र.
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