सोशल मीडिया ने तो आजकल हर किसी की ज़िंदगी में भूचाल ला रखा है। वैसे भूचाल शब्द तो बहुत छोटा है सोशल मीडिया के असर के सामने। हमें तो सुनामी शब्द का प्रयोग करना चाहिए। 
मोबाइल से निकलने वाली सोशल मीडिया की अल्ट्रा वॉयलेट तरंगों ने सबको अपनी चपेट में कुछ इस कदर ले रखा है कि कोई भी उससे अछूता नहीं रहा है। 
मैं कभी-कभी सोचती हूं कि जब सोशल मीडिया नामक पंछी हमारे जीवन में नहीं था तब भी तो हम जी ही रहे थे। और भगवान की कृपा से बहुत बढ़िया जी रहे थे।‌
सबके पास वक़्त होता था अपनों के पास बैठने का। उनसे थोड़ी गुफ्तगू करने का। बड़ों का हाल-चाल पूछने का। पर आज सब अपने अपने कमरों में बंद सोशल मीडिया के अनेकों प्लैटफॉर्म को एक्सप्लोर करते नज़र आते हैं। हालत ये हो गई है कि यदि सब एक जगह बैठे हैं तो भी सबके हाथों में अपना मोबाइल है और उसपर वो सोशल मीडिया के ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब जैसे अनगिनत प्लैटफॉर्म पर हंसते गुनगुनाते नज़र आते हैं। 
इससे भी मज़े की बात ये है कि हमारे घर के सदस्यों की ज़िंदगी में क्या हो रहा है ये जानने का समय किसी के पास नहीं है। पर क्रिकेटर, गायक, फिल्मी जगत के लोगों की ज़िंदगी में क्या हो रहा है ये जानना अत्यंत आवश्यक है। भाई साहब, क्यों ना हो! ये ही तो आज का सामान्य ज्ञान बन गया है। 
पहले सब इकट्ठे बैठ कर सोनी, स्टार प्लस, ज़ी टीवी पर आने वाली नई फिल्म बड़े चाव से देखते थे। यदि फिल्म दोपहर को आ रही होती थी तो मां पहले ही खाना बनाकर बैठ जाती थी। फिर सब साथ मिलकर फिल्म का आनंद लेते थे। 
पर आज इतने सारे ओ टी टी प्लैटफॉर्म आ गए हैं कि बच्चे पहले ही मूवी देख लेते हैं। मां अलग से देखती है। और पिता भी ऑफिस में खाली समय में देख लेते हैं। तो वो साथ बैठकर एक फिल्म को इंजॉय करने का रिवाज़ पुराना ही हो गया है। 
बहुत से लोगों के लिए सोशल मीडिया कमाई का साधन भी बना है जो कि बहुत बढ़िया बात है। जानकारी का भंडार मिलता है यहां पर, इसमें भी दो राय नहीं है किन्तु कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है। 
पर….इस बार बहुत ज़्यादा खोना पड़ गया है। 
🙏
लेखिका
आस्था सिंघल
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