अस्मतें कब तक लुटती रहेगी,
आंखों से कब तक दरिया बहेंगी।
कौन धोयेगा गुनाहों के पन्नों को,
कब तक बचपन की यादें कैद रहेंगी।
किसी की बेटी में कैसे देख लेता है कोई जिस्म ही जिस्म
यह सोच ना जाने समाज से कब हटेगी।
अच्छी यादें तो गुम हो जाएं बुरी पल पल तड़पाए
कब इन अनचाही यादों से निजात मिलेगी।
कैसे छुपाए इन दरिंदों से अपनी बेटियों को, ‘सीमा’
या फिर सच में ही बेटियां बोझ रहेंगी।
स्वरचित सीमा कौशल यमुनानगर हरियाणा
