इंजीनियरिंग कालेज में आखरी वर्ष के विद्यार्थियों का अलग ही जलवा होता है। पूरा विद्यालय उनका सम्मान करता है। यह वर्ष पढाई के अतिरिक्त प्रोजेक्ट निर्माण तथा भविष्य के कैरियर निर्माण के लिये भी जाना जाता है। माना जाता है कि इस अंतिम वर्ष में जो कमजोर पड़ जाता है, उसे जीवन में अधिक संघर्षों से गुजरना होता है।
कालेज में विभिन्न कंपनियों ने कैंपस सलेक्शन के लिये आना आरंभ कर दिया है। वास्तव में कुछ बेहतरीन छात्रों के पास तो अनेकों बेहतरीन कंपनियों द्वारा नौकरी का आफर मिल चुका है। कुछ छात्र अभी भी संघर्ष कर रहे हैं। कुछ ऐसे भी हैं जिन्होंने अभी एम टेक की पढाई का निश्चय किया है। वे सक्षम होने पर भी कंपनियों के कैंपस सलेक्शन के लिये नहीं गये।
कालेज में इस समय जिस युवक की चर्चा बढ चढकर हो रही है, वह कोई और नहीं, बल्कि संध्या और राजीव का पुत्र प्रवेश ही है। प्रवेश इस कालेज का सबसे होनहार छात्र, हर वर्ष न केवल कालेज में प्रथम आया अपितु विश्वविद्यालय स्तर पर हर बार सूची में अपना स्थान बनाकर कालेज को भी सम्मान दिलाता रहा। इंजीनियरिंग के छात्र की अच्छी क्षमता का प्रतीक गेट की परीक्षा वह गत वर्ष तथा फिर से अच्छे अंकों से उत्तीर्ण कर चुका था। अनेकों भारतीय तथा विदेशी कंपनियां भी उसे अपने साथ अच्छे पैकेज पर काम कराने को उत्सुक थीं। अनेकों विश्वविद्यालयों की तरफ से भी उसे इंजीनियरिंग में स्नातकोत्तर की पढाई जारी रखने के निमंत्रण थे। आम भाषा में कह सकते हैं कि प्रवेश की दसों अंगुलियां घी में थीं। पर आज जबकि उसके सबसे ज्यादा खुश होने का समय था, प्रवेश बहुत दुखी था।
मनुष्य संसार से सब कुछ छिपा सकता है। पर उसका अंतर्मन निश्चित ही वह जानता है, जो कि उसकी सबसे बड़ी भूल थी। केवल मनुष्य का अंतर्मन ही जानता है कि उसने किसी को धोखा दिया था। जिन प्रश्नों का कभी भी कोई उत्तर नहीं पूछता है, वही प्रश्न उसके मन को बार बार चोट पहुंचाते हैं। बार बार उसे याद दिलाते हैं कि तुमने कोई अपराध किया है। अपने संस्कारों को धोखा दिया है। धोखा दिया है अपनी उस माॅ को जिसने तुम्हारे लिये एक एक दिन किस तरह गुजारे। धोखा तो दिया है निश्चित ही उस शहीद पिता को, जिनके पुत्र होने का सौभाग्य उसे मिला है। और यह धोखा उसने दिया किस लिये। केवल एक सुंदर लड़की के प्रेम में। क्या कोई प्रेम इतना बड़ा हो सकता है कि जिसे पाने के लिये कोई भी अपने संस्कारों को धोखा दे। नहीं। यह तो बिल्कुल गलत है। शायद चार वर्ष होने को आये हैं। आजतक वह उस अपराध को भुला नहीं पा रहा है। उसका अंतर्मन चीत्कार कर बोलता है कि तुम अपनी माॅ और पिता के अपराधी हो। जिस प्रेम के लिये तुमने अपनी माॅ की ममता को धोखा दिया, वह प्रेम भी तुम्हें निश्चित धोखा देगा। वास्तव में जिसे प्रेम समझा गया था, वह प्रेम था ही कब। एक नादान आयु का वह आकर्षण जिसमें कुछ भी सत्य तो नहीं ।
ऐसा नहीं है कि अब प्रवेश का संपर्क शिवानी से नहीं है। आज भी वह शिवानी से फोन पर बात करता रहता है। विभिन्न सोशल मीडिया पर उसके साथ जुड़ा हुआ है। आज भी उसके अनेकों मित्र यही समझते हैं कि अपनी अपनी पढाई पूर्ण कर दोनों साथ साथ जीवन के सफर में हमसफर भी बनेंगे। इतनी गहरी बात खुद संध्या तथा जानकी देवी को भी पता है। जानकी देवी तो वैसे भी अब नाती की शादी देखने की अंतिम इच्छा मन में लिये जी रही हैं। लगता तो नहीं कि किसी को भी प्रवेश तथा शिवानी के संबंधों से कोई आपत्ति है।
शिवानी प्रवेश के विद्यालय में उसकी साथी, सुंदरता में कामदेव की पत्नी रति के समान, एक प्रतिष्ठित परिवार की कन्या। सुंदर लड़कियों में थोड़ा सा गुरूर तो होता है। इसमें कोई गलत बात भी नहीं है। आखिर गुरूर के लिये भी तो कुछ आवश्यक है।
पर लगता है कि सुंदरता पर गुरूर करना पूरी तरह सही नहीं है। गुरूर गुणों पर होना चाहिये। पर वास्तव में गुण होने पर मनुष्य गुरूर करना ही भूल जाता है।
एक निर्वादित सत्य यह भी था कि शिवानी एक होनहार छात्रा नहीं थी। इंटरमीडिएट के बाद तो उसे विज्ञान वर्ग में दाखिला भी नहीं मिला। पर इसमें भी कोई आपत्ति न थी। कला वर्ग के विषयों में वह पहले ही स्नातक बन चुकी थी। इस वर्ष स्नातकोत्तर की छात्रा थी।
प्रवेश पढाई के बोझ के कारण अनेकों बार उससे महीनों बात नहीं कर पाता। वास्तव में उसे लगता कि शिवानी इस विषय में कितनी सहनशील है। ज्यादातर प्रेमिकाएं तो बात बात पर नाराज होती रहती हैं। शिवानी की इच्छा का उसने उस समय भी मान रखा जबकि वह अपनी माॅ के सपनों को पूरा करने जा रहा था। प्रवेश को लगता कि प्रेम में अपने माॅ के सपनों का बलिदान कर उसने अपना सर्वस्व पा लिया है। फिर एक प्रेमी के खुद के सपने क्या हैं। प्रेमी तो अपनी प्रेमिका के सपनों को ही अपना सपना बना लेता है। वह इंजीनियरिंग की पढाई में जितनी मेहनत कर रहा है, वह शिवानी के सपनों के लिये ही तो। आखिर शिवानी ही तो चाहती थी कि उसका प्रेमी जीवन में बहुत उन्नति करे। हालांकि वह उन्नति की परिभाषा भौतिक उन्नति से आरंभ होकर भौतिक उन्नति पर ही पूर्ण हो रही थी। अपनी माॅ को धोखा देकर वह पहले ही चारित्रिक पतन के मार्ग पर चल चुका था।
आज जबकि प्रवेश ने अपने भावी जीवन में भौतिक उन्नति की पराकाष्ठा को सुरक्षित कर लिया था। फिर भी वह कुछ खोया खोया सा रह रहा है। अनेकों दिनों से वह शिवानी को अपनी सफलताओं को बताना चाह रहा है। अपनी मेहनत से अर्जित अनेकों राहों में उसे किस राह पर बढना है, यह भी वह अपनी प्रेमिका से पूछकर तय करना चाहता था, पर शिवानी उसका फोन ही नहीं उठा रही थी। विभिन्न सोशल मीडिया के संदेशों को भी देख नहीं रही थी।
वैसे धैर्य सच्चे प्रेम का लक्षण है। शिवानी ने भी अनेकों बार धैर्य रखा था। अनेकों बार आवश्यक पढाई के कारण प्रवेश ने भी उसका फोन नहीं उठाया था। पर आज प्रवेश अधीर हो रहा था। शायद यह उसके लगातार अंतर्मन की आवाज थी जिसे वह सुनकर भी अनसुना नहीं कर पा रहा था। क्या जिस प्रेम के लिये उसने अपने संस्कारों को धोखा दिया है, वही प्रेम तो उसे धोखा नहीं दे रहा। आखिर क्यों नहीं। धोखे से आरंभ प्रेम का परिणाम धोखा ही तो होता है।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
