नारायणी देवी एक छोटे से गांव में अपने बेटे अमर के साथ रहती।‌ पति की मृत्यु के बाद उसने बहुत मेहनत कर अपने बेटे को पढ़ाया था। उसे सनातन की पढ़ाई के बाद उच्च शिक्षा के लिए शहर भी भेजा था। 
शहर से हर माह उसका बेटा उसके लिए ख़त लिखता था। नारायणी देवी बहुत चाव से उसका खत पढ़ती थी। हालांकि वह केवल पांचवीं कक्षा तक ही पढ़ीं थीं, किन्तु उनके बेटे ने उन्हें इतना पढ़ना-लिखना तो सिखा ही दिया था कि वह ख़त पढ़ सकतीं थीं। 
हर माह की पहली तारीख को जब डाकिया आवाज़ लगाते हुए आता तो वह अपने घर के दरवाज़े पर उसकी प्रतीक्षा करती रहतीं। 
जब उसके बेटे ने कॉलेज में प्रथम स्थान प्राप्त किया था तब वो उसे पढ़कर बहुत रोईं थीं। फिर उन्होंने पूरे मोहल्ले को लड्डू बांटे थे। डाकिया भी उनकी इस खुशी में शामिल हुआ था। 
बेटे ने पढ़-लिख कर शहर में ही नौकरी करने की सोची। हालांकि उसने नारायणी देवी को भी अपने पास बुलाना चाहा‌। पर नारायणी देवी ने मना कर दिया। बोलीं,”मैं भली, मेरा गांव भला।” 
बेटा हर माह मनी आर्डर से पैसे भेजता और साथ ही ख़त भी। नारायणी देवी को मनी आर्डर से ज़्यादा ख़त का इंतज़ार रहता। 
धीरे-धीरे ख़त कम होने लगे। जिसपर नारायणी देवी डाकिये से लड़ जाती। ” क्यों रे! तू आजकल सही से काम नहीं करता। मेरे लल्ला का ख़त खो देता है तू।” 
“अरे! मांजी! मैं क्यों ऐसा करूंगा? आज तक कभी हुआ है ऐसा? अब तुम्हारा बेटा केवल मनी आर्डर ही भेजता है तो मैं वही दूंगा ना।” डाकिया हर बार बोलता। 
बहुत महीने बीत गए। अमर का केवल मनी आर्डर आता था। नारायणी देवी की आंखों में मनी आर्डर लेते समय आंसू निकल आते थे। डाकिया भी उनकी वेदना को भली-भांति समझ रहा था। पर वो कर ही क्या सकता था। 
पर हर माह नारायणी देवी उसी उत्साह से डाकिए का इंतज़ार करती। पर ख़त ना आने पर मायूस हो कर रह जाती। उनकी आंखों में ख़त के इंतज़ार की वेदना साफ झलकती थी। वो अपने बेटे की सलामती जानने के लिए झटपटा रही थीं। पर उनके बेटे को उनका कोई ख्याल नहीं था। 
एक सुबह डाकिया खुशी से चिल्लाते हुए आ रहा था। 
“नारायणी मां, देखो ख़त आ गया। ख़त आ गया।” 
पर आज नारायणी देवी डाकिए का इंतज़ार करती दरवाज़े पर नहीं खड़ी थी। उसने घर में झांककर देखा तो उसके होश उड़ गए। नारायणी देवी फर्श पर गिरी पड़ी थीं। 
डाकिये ने आस-पास के लोगों को आवाज़ लगाई। वैद्य ने आकर देखा। उसने नम आंखों से बताया कि अब नारायणी देवी इस संसार में नहीं रहीं। सबकी आंखें नम हो गईं।
डाकिया उनके पास आकर रोते हुए बोला,”नारायणी मां, ये ख़त जिसका आप कब से इंतज़ार कर रहीं थीं, वो तो पढ़ लेते।” 
डाकिए ने ख़त खोला और पढ़ना शुरू किया,
“मां, 
मैं सकुशल हूं। आशा करता हूं आपको समय से मनी आर्डर मिल जाता होगा। आपको बताना चाहता था कि मैंने शादी कर ली है। और अब नयी नौकरी के सिलसिले में मैं दूसरे शहर‌ में बस गया हूं। पता भेजकर क्या करुं, आप तो आएंगी नहीं। आपको हर माह मनी आर्डर मिलता रहेगा। 
प्रणाम” 
ये पढ़कर सब हैरान हो गए। तभी एक बुजुर्ग की निगाह मेज पर पड़े ख़त पर गयी। उसने ख़त खोल कर डाकिए को पढ़ने को दिया। ख़त नारायणी देवी ने लिखा था।
“गांव के साथियों, आपका धन्यवाद, जो मुझे इतना प्यार दिया। आप सब से विनती है कि मेरी मृत्यु की खबर मेरे बेटे को ना दी जाए। और हर माह जो मनी आर्डर मेरा बेटा भेजता है, उसे गांव के सरपंच गांव की भलाई के लिए इस्तेमाल करें।
सबको आशीर्वाद
नारायणी” 
इस खत ने गांववासियों को भावविभोर कर दिया। नारायणी देवी मरने के बाद भी गांव के प्रति अपने कर्तव्य को नहीं भूलीं। और उनका बेटा, जीते-जी अपनी बूढ़ी मां के प्रति अपने कर्तव्य को भूल गया।
🙏
लेखिका
आस्था सिंघल
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