एक वक्त था जब हम सबके जीवन में डाकिया और डाक बहुत ही अहम स्थान रखता था।
सुख-दुख की धूप-छांव मानव समाज में आदि काल से ही अपने रंग-ढंग दिखाती आ रही है और आज भी मानव जीवन के साथ उसकी यह आँख मिचौली बाक़ायदा जारी है। जब से आदमी ने संगठित समाज के रूप में अपनी विकास यात्रा का शुभारम्भ किया, ठीक तभी से उसके जीवन में समाचारों और संदेशों का महत्व बढ़ गया।
डाकिया डाक लाया डाकिया डाक लाया, ये गाना, तो हम सबने बचपन से ही सुना और गाया है।
ख़ाकी कपड़ा पहन कर इक भैय्या कहीं दावत का न्योता तो कहीं संबंधियों की चिट्ठी हैं लाये।
साइकिल पर सवार झोली लटकाये,किसी के घर ख़ुशी तो, किसी के घर ग़म का समाचार है लाये।
किसी के यहाँ आयी है नानी की चिट्ठी, तो किसी के यहाँ लाये है दादी की चिट्ठी।
चिलचिलाती धूप हो, या हो कड़ाके की ठण्ड, भैय्या से समाचार मिलने न होते थे बंद।कभी झमाझम बादल बरसते में भीगते भैय्या, पूर्ण करते थे आठ घंटे की ड्यूटी।
चिट्ठियों को सँभालते, घर-घर थे पहुँचते,
साइकिल पर सवार, बजाकर घंटी करते हुए नमस्ते।
डाक आयी डाक आयी भैय्या देते थे आवाज़।
उन्हें होती थी ख़बर किसके यहाँ बँटेगी आज पास होने की मिठाई और किसकी होगी फ़ेल होने पर पिटाई।
सभी को देते खुशियों की सौगात तो वहीं तेजी से बजाते किसी अनहोनी या अकस्मात सूचना भी तार लाकर।
ख़ाकी कपड़े में साइकिल पर घंटी बजाते भैय्या ही तो थे…. जो कभी किसी को ख़त पढ़ कर सुनाते,तो कभी किसी की ख़ुशी में झूम जाते।
पर न अब दिखते हैं वे भैय्या, न दिखते हैं वे पोस्टकार्ड/लिफाफे व अंतर्देशीय पत्र।सब हो गये हैं निरे स्वप्न। न बची वह प्रतीक्षा न ही रोज का बाट जोहते घड़ी टिकटिक पर अपना नज़र लगाना।
अब तो देखो ऑनलाइन का है ज़माना डाकिए की क जगह अब ई-मेल,विडिओकॉल्स, एवंफोन कॉल्स की चहुँओर है बहार।
सबके कानों में ईयर फोन और हाँथों में है मोबाइल का राज।
भैय्या भी अब कुरीयर सुविधा में जुड़े हैं। सिर्फ़ यही नहीं, आजकल तो, अमेज़न फ़्लिपकार्ट ही घर-घर लाते हैं पार्सल,पैसे तक ऑनलाइन ही ट्रांसफ़र है हो जाते। लोगों ने भी कर ली है अब डिजिटल युग से ही दोस्ती।
कहीं कुछ भी नहीं है देरी, बस अब है एक फ़ोन कॉल की ही देरी।
पत्र-व्यवहार का सिलसिला ही खत्म नहीें हुआ, आना-जाना, मिलना-जुलना भी बंधन में फंस गया है।
वो भी क्या सुनहरे आशान्वित दिन थे जब डाकिया महोदय का इन्तजार और देखते ही अपनी डाक के विषय में जानकारी प्राप्त करना भी प्रतिदिन की दिनचर्या में सम्मिलित हुआ करता था। खास-खास मित्रों व परिवारी जनों के पत्रों को सहेज कर रखना, समय मिलने पर उन्हें उलट पुलट कर पढ़ना भी कितना रुचिकर हुआ करता था। सभी के पत्रों का उत्तर लिखना भी आवश्यक कर्त्तव्य में शामिल हुआ करता था। कभी विलंब हो हो जाए तो पत्रोत्तर की प्रथम पंक्ति में ही क्षमा याचना संस्कारित होने का परिचय देती थी।
अभी कुछ दिन पहले की ही बात है मैं अपनी एक डायरी खोज रही थी कि मुझे सन् 1979 का अपने बाबू जी का लिखा हुआ एक पत्र मिल गया,सच मानिए मैंने उस पत्र को बारम्बार पढ़ा,रखने का मन ही नहीं हो रहा था,तत्कालीन सारे परिदृश्य आँखों के समक्ष चलचित्र की भांति घूम रहे थे। मैं अपने उन एहसासों को शब्दों में पिरो नहीं सकती। उस पत्र के दो माह बाद ही बाबू जी को पैरालिसिस का अटैक फिर सन् 1983 मई में देहावसान। अब कण्ठ के साथ-साथ लेखनी भी अवरुद्ध हुई जाती है।
धन्यवाद!
लेखिका –
सुषमा श्रीवास्तव
उत्तराखंड
मौलिक रचना
