एक प्यारे से पवित्र बंधन की गांठ खोलकर
एक झटके में ही बिखर गया आशियाना उसका
जो सजाया था उसने उसकी यादें जोड़ जोड़कर
ना अपना था वो, ना अजनबी ही था उसके लिए
बस हमदर्द बन गया था , दो मीठे बोल बोलकर
ना उसने कभी बांधा था ना उसने कभी छोड़ा था
मजबूरियों ने बदल दिया वो रास्ता एक मोड़ पर
एक दोस्त से भी बढ़कर जीने की वजह थी जो
वो चल दिया उसे आज यूं तन्हा तन्हा छोड़कर
मालूम है कि आएगा एक दिन फिर से उसके पास
दोस्ती का कर्ज़ चुकाना है अब तराजू से तोलकर
जरूरी नहीं कि दोस्ती में पास रहना ही शर्त हो
एक दूसरे के दुख दर्द दिल में महसूस हों अगर
संगीता शर्मा” प्रिया”
